पिता

राजविन्दर कौर

     पिता पर कोई कविता, चंद पंक्तियाँ, कोई लेख या कोई किताब नहीं, कई महाकाव्य लिखे जा सकते हैं। पिता बनने से शुरू हुई यात्रा को .... जीवन की अंतिम साँस तक जिन जिन मनोभावों ,संघर्षों, मानसिक पीड़ाओं, कुछ न कर पाने की बेबसियों, बच्चों के लिए क्या जो कर जाऊँ की लालसा , बच्चों के अपनी उम्मीदों पर खरा न उतरने के दुःख तक का अन्तर्संघर्ष पिता को अंतिम वर्षों में मौन, अंतर्मुखी , निष्ठुर , क्रूर बना देता है और दयनीय भी।


हाँ, हम सब ऐसा ही समझते हैं। जब हम अपने मन की करने लायक हो जाते हैं, जब हम अपने जीने लायक हो जाते हैं, तो हम उनका सब कुछ किया क्षण भर में भुला देते हैं। उनकी बातों पर चिढ़ने लगते हैं। उनकी उपस्थिति से दूर भागने लगते हैं। उनके मशवरों पर कुढ़ने लगते हैं। उनकी दवाईयों के खर्च का हिसाब रखने लगते हैं। उनसे मिलने आये उनके दोस्तों, रिश्तेदारों के चाय , नाश्ते का खर्च हमारी दुखती रग की तरह हो जाता है। उस वक्त हम उनका किया सब कुछ भूल जाते हैं। हमको केवल यह याद रहता है कि यह उनका फ़र्ज़ था, उन्होंने हमें पैदा किया है। पिता सारी उम्र अपने उस फ़र्ज़ से बंधा रहता है। ज्यादातर औलादें अपने पैरों पर खड़ा होते ही उनके इस फ़र्ज़ की धज्जियाँ उड़ा देती हैं। 

बस, उसी दिन से पिता खुद को हारा हुआ मानने लगता है। उसकी हिम्मत टूटने लगती है। वो बूढ़ा होने लगता है। उसकी भूख कम होने लगती है। उसकी खाँसी बढ़ने लगती है। उसे कम दिखने लगता है। कम सुनने लगता है। वह चुप रहने लगता है। अपने दर्द , बीमारियों, घावों को छुपाने लगता है।  घर में होते हुए भी वह अनुपस्थित -सा लगता है।


     पिता भी तो जिद्दी होने लगते हैं। मन का न हो तो खाना अधूरा छोड़ देते हैं। चाय में ज्यादा चीनी की आदत है, तो कम में नहीं मानते। उनके अंदर कुछ चलता रहता है। माँ के अतिरिक्त कोई नहीं समझ पाता। कभी कभी तो माँ भी नहीं। वो केवल पुराने दिन ही क्यों याद करते हैं ? क्यों वो नए को आगे बढ़कर नहीं अपना पाते। उस वक्त वो इतने स्वार्थी क्यों हो जाते हैं? जब बच्चे नए घर की बात करते हैं? बच्चों को नए सपने दिखाकर, उनको नए आसमान में उड़ने का हौंसला देकर वो पीछे क्यों खींचने लगते हैं? क्यों उनको नए और पुराने के बीच पिसती हुई अपनी औलादों की छटपटाहट नहीं दिखती? क्यों वो नहीं देखना चाहते अपने बच्चों के साथ नया आसमान? क्यों उनको अपने हाथों से बनाया जर्जर घर छोड़कर नए घर में जाने से डर लगता है? और भी बहुत कुछ ऐसा ही....?? क्यों इतने सारे सवाल बच्चों के मन में छोड़कर पिता चुप हो जाते हैं? ... और फिर एक नया पिता उसी पुराने ढर्रे पर चलने लगता है।


      पिता जिद्दी होते हैं। पिता नारियल की तरह होते हैं। पिता अखरोट होते हैं। बाहर से सख़्त, बहुत सख़्त । अंदर से मख़मल। उस मख़मल को देखना है तो तुम्हें उनके अंदर उतरना होगा। उस मख़मल को छूना है, तो उनकी स्मृतियों को छेड़ना पड़ेगा। उनसे बात करनी पड़ेगी उनके युग की। उनके संघर्षों की। उनके कॉलज के दिनों की। उनके दोस्तों की। उनकी जीतों की। उनकी विफलताओं की। उनको सुनना पड़ेगा, बिना उबासी लिए, उत्साहित मन से। वो सब कुछ कह देंगे। उस वक्त अस्थमा उनकी सांस नहीं अटका पायेगा। उस वक्त शरीर के किसी हिस्से का असहनीय दर्द भी याद नहीं रहेगा उन्हें । उनकी आँखों में चमक लौट आएगी। क्योंकि वो चाहते हैं कि कोई उनको सुने, केवल सुने।


        कुछ पिता सख़्त होते हैं, कुछ सौम्य, कुछ शीतल। कुछ बहुत बोलने वाले, सब कुछ कह लेते हैं, कुछ बहुत गुस्से वाले, आँखें सदा लाल कि मन डरा रहे। कुछ बड़े जॉली, बड़े हँसमुख। बड़े हो गए बच्चों को ऐसे कोई पिता अच्छे नहीं लगते। उन्हें उनका चुप रहना अच्छा लगता है, टोकना बहुत खटकता है। उनका घर अच्छा लगता है, पर बहुतों को उनका घर में रहना अच्छा नहीं लगता। उनकी सम्पत्ति अच्छी लगती है, सम्पत्ति पर अपना हक जताना अच्छा लगता है, पर माता- पिता को भी अपनी सम्पत्ति मानना अच्छा नहीं लगता। उनके थोड़े बहुत बचे हुए जमा पैसे पर नज़र रहती है, पर उनके इलाज़ के खर्चे पर खुंदक होती है। पिता हमें इतने उलझे हुए क्यों लगते हैं? उनकी औलादें क्यों समझदार

नहीं हो पातीं उनके अनुसार? 

शायद......

पिता को केवल पिता होकर समझा जा सकता है। 


~राजविन्दर

#fathersday

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