ठाकुर  की रखैल


 


 


नीलू सिन्हा


गुलाबों को सब ठाकुर की रखैल कहते थे। यही नाम उसकी पहचान बन गया था। वो कोई तवायफ नहीं थी। एक ब्याहता औरत थी। चमन से शादी हुई थी उसकी जो ठाकुर की जमीनों पर बंधुआ मजदूर था। 
अपनी माँग की सिन्दूर की पवित्रता उसने खुद नहीं खोई थी। उसकी गरीबी और लाचारी उसे झोपड़े से हवेली तक ले आई थी। 
चमन को मजदूरी के बदले इतना भी नहीं मिलता था कि दो वक्त की रोटी पेट भरके दोनों मिया बीवी खा सवेंâ। गुलाबों थी बला की खूबसूरत। जहाँ रोटी ही पूरी नहीं होती थी वहाँ तन ढकने को कपड़ा कहाँ से पूरा पड़े। अपनी जवान देह को चीथड़ों में ढ़ाकना मुश्किल हो गया था। एक दिन चमन ने कहा– 
''गुलाबों अगर मेरे साथ खेतों में तू भी मजदूरी कर ले तो जिन्दगीं थोड़ी ठीक निकल जाएगी।'' 
और अगले दिन से गुलाबों भी चमन के साथ ठाकुर के खेत चली गई। 
ठाकुर वक्त बेवक्त खेतों की पड़ताल के लिए आ जाया करता था। ऐसे ही एक दिन उसकी नजर गुलाबों पर पड़ी। 
''अरे यह किसकी मेहरिया है।'' 
गुलाबों को ताकता हुआ जोर से बोला था ठाकुर। 
साफ जाहिर था ठाकुर की गन्दी नजर गुलाबों पर पड़ चुकी है। वो चीथड़ों से अपने तन को ढ़कने की नाकाम कोशिश करती हुई चमन की ओट में खड़ी हो गई। चमन हाथ जोड़े खड़ा था। 
''माई-बाप मुनीम जी से पूछकर अपनी मेहरिया को अपने साथ काम पर लगाया है। दुगनी जान काम करेगी तो दिन थोड़ा आराम से कट जाएँगे।'' 
गिड़गिड़ाते हुए चमन ने कहा था। 
ठाकुर ने अचानक तेवर बदलते हुए और दरियादिली दिखाते हुए कहा– 
''अरे चमनवा हमने कब तुम्हें किसी चीज को मना किया है। अच्छा ऐसा करना शाम को गुलाबों को हमारी पुरानी हवेली भेज देना। बहुत दिनों से सफाई नहीं हुई। वहाँ कुछ साफ सफाई करेगी और बदले में नजराना भी मिल जाएगा।'' 
चमन कुछ आगे बोल ही न सका बस हाथ जोड़े खड़ा रहा। आँखों में आँसू भर आए थे। ठाकुर की दरियादिली पर नहीं, अपनी बेबसी पर। सब जानते थे पुरानी हवेली ठाकुर की अय्याशी का अड्डा है। पर गरीब बेचारा क्या करें। जीवन से मोह न हो तो उसी पल जान दे दे। पर कमजोर मानस वो भी नहीं कर सकता। 
गुलाबों भी ठाकुर की नजर भाँप गई थी। मरने मारने की भी धमकी दी। लेकिन पति की लाचारी के आगे हार गई। यहाँ पति इतना कमजोर है कि अपनी ब्याहता को अपनी गरीबी से छुटकारा पाने के लिए दूसरे से सांझा करने को भी तैयार हो गया था। 
गुलाबों भी अपनी जिन्दा लाश को ढोए पुरानी हवेली पहुँच गई। सफाई का तो बहाना था। वहाँ तो ठाकुर ने गुलाबों के लिए सेज सजाई थी। नए कपड़े, इत्र सबकुछ उसके लिए तैयार रखा था।
''जाओ नहाकर पहले ये कपड़े पहन आओ।''
ठाकुर ने इस तरह बेशर्मी से कहा था कि गुलाबों के तन बदन में आग लग गई थी। 
एक नौकरानी गुलाबों को अन्दर ले गई और सजाकर ठाकुर के पास ले आई। गुलाबों एक बार तो मन्त्रमुग्ध सी हो गई थी अपना रूप देखकर। कीमती वस्त्र और आभूषणों में रानी से कम नहीं लग रही थी। अपने ही तुलना झोपड़े में रहने वाली गुलाबों से की तो भ्रम टूटा। ये तो मायाजाल है। झौपड़े वाली गुलाबों ही हकीकत है। और अगले ही पल उसे खुद पर शर्म आने लगी कि यह क्या सोच रही है वो। सोचने लगी एक स्त्री की माँग का सिन्दूर और उसकी पवित्रता क्या इतनी सस्ती होती है कि कोई भी उसपर हाथ रख दे। फिर खुद को ही जवाब दिया स्त्री नहीं यहाँ तो गरीब स्त्री की बात है जिसका पति इतना कमजोर है कि आवाज भी नहीं उठा सकता। अपने मान सम्मान के लिए लड़े भी तो किससे। और फिर एक गरीब और कमजोर व्यक्ति की ब्याहता पर तो सब अपना हक समझते हैं। 
अगले ही पल फिर गुलाबों के विचारों ने करवट ली। सोचा अगर मरना होता तो गरीबी की आग में ही मर जाती लेकिन अगर जीवन इस मुकाम पर ले आया है तो इसका अन्जाम भी देख लूँ। और बिना किसी विरोधी के ठाकुर को समर्पण कर दिया। 
इस रात ने गुलाबों को पूरी तरह बदल दिया था। पता नहीं कहाँ से इतना विश्वास आ गया था उसमें? जब सुबह वह हवेली से विदा हुई तो ठाकुर ने उसके हाथ में ढेर सारे रूपये रख दिए। रास्ते भर सोचती रही। गरीब गुलाबों की क्या कीमत थी। मरती भी तो मुश्किल से संस्कार होता। और आज उसके पास कितने रूपये है। इज्जत बेचकर ही सही पर उसकी कुछ कीमत तो हैं। झौपड़े में गई तो देखा चमन जमीन पर लेटा था क्योंकि खाट भी नहीं थी सोने को। गुलाबों को देखा तो सकपका के उठ बैठा। एक पल के लिए तो पहचान भी नहीं पाया। 
''कितनी सुन्दर है गुलाबों।'' मन में सोचा और नजरे नीची करके बैठ गया। 
गुलाबों ने सारे रूपये उसकी हथेली पर रख दिये। और ताना मारा 
''तुम्हारी गुलाबों की पहली कमाई''   
भीतर तक भेद गयी थी चमन को यह बात। पर रूपये की चमक के आगे यह चुभन कम थी। इस चमक के आगे तो गयी रात को भी भूल गया था वो। 
सिर्फ  इतना ही कहा– 
गुलाबों भगवान ने धरती पे हम गरीबों को मालिकों की सेवा के लिए ही उतारा है। ये तो हमार धन भाग की हमें नजराना मिला नहीं तो गरीबों की इज्जत सिर्पâ कुचलने के लिए ही होती है। 
सुनकर गुलाबों सिर्फ  हँस सी दी थी।  
अब तो यह सिलसिला ही बन गया था फर्वâ बस इतना था कि गुलाबों झौपड़े से पक्के मकान में रहने लगी थी और चमन बँधुआ मजदूर नहीं था ठाकुर का खास आदमी था। पति-पत्नी का रिश्ता तो कब का आहुति चढ़ गया था। 


 


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