बचपन

  


    डॉ उषा किरण

दिन अनूठे ये जीवन के,

हम हीरो अपने गलियन के।

   बचपन के दिन खूब निराले,

    संगी-साथी सब मतवाले।

नव उमंग का जैसे हो रेला,

हर पल खुशियों का ही मेला।

     न सुध तन के कपड़े की,

    न साथी संग हुए झगड़े की।

क्षण में रत्ती क्षण में माशा,

न कोई आशा न ही निराशा।

   खूब तमाशा मिलकर करना,

   कीचड़ में भी खूब अकड़ना।

ये करते हैं जब शैतानी,

याद बड़ों को आती नानी।

    छवि नटखट इनकी शैतान की,

   पर होते दर्शन इनमें भगवान की।

बचपन है आँगन की किलकारी,

गूँजती जिनसे है फुलवारी।

    बचपन के क्या ठाठ निराले हैं, 

      ये होते अलमस्त निराले हैं।

न हिन्दू न मुस्लिम बचपन,

न ही सिख, ईसाई बचपन।

      बचपन वह मोती अनमोल,

     न मिलता धन दौलत तोल।

अन्तर में जो मिश्री घोले,

यादें बचपन की बिन बोले।

      बीत गया तो फिर न आता,

      बस यादों में ही रह जाता।

  डॉ उषा किरण

पूर्वी चंपारण, बिहार

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