ग़ज़ल



विद्या भूषण मिश्र "भूषण"

~~~~~~~~~~~~~~~~~

आजकल सबको पड़ोसी से भी डर लगता है, 

कोई वीरान सा हर एक शहर लगता है!!

~~~~~

रोज बरसों से जो हमराह बन के चलता था, 

अब वही शख़्स क्यों अनजान बशर लगता है!!

~~~~~

पेड़ पीपल का जिसकी छाँव में हम खेले थे, 

वक्त़ की मार से वो ठूँठा शज़र लगता है!! 

~~~~~

वादियाँ हो गयीं वीरान गूँजती चीखें, 

ये मेरे मुल्क़ के दुश्मन का कहर लगता है!!

~~~~~

फूल खिलते थे, महकती थी जहाँ की धरती,

वो चमन आज हमें जैसे सहर लगता है!! 

~~~~~

है बड़ा बेशरम अपना ये पडो़सी यारो, 

नाम के उल्टा इसका काम मगर लगता है!! 

~~~~~

पार सरहद के एक मुल्क है ऐसा "भूषण" , 

रोज़ बाजा़र-ए-दहशत का उधर लगता है!!

------------------------------

*_ विद्या भूषण मिश्र "भूषण"_ बलिया, उत्तरप्रदेश*

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

Popular posts
अस्त ग्रह बुरा नहीं और वक्री ग्रह उल्टा नहीं : ज्योतिष में वक्री व अस्त ग्रहों के प्रभाव को समझें
Image
परिणय दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
Image
प्रेरक प्रसंग : मानवता का गुण
Image
दि ग्राम टुडे न्यूज पोर्टल पर लाइव हैं अनिल कुमार दुबे "अंशु"
Image
भैया भाभी को परिणय सूत्र बंधन दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
Image