बनकर आफताब चमकते हैं

 


किरण झा

चलो आज बनकर आफताब फलक पर चमकते हैं

खाक ए तमन्ना है तो क्या थोड़ा सा और जलते हैं


काश आज कोई मुझपे इनायत हो जाये

हर अधूरे ख्वाब दिल के हकीकत हो जाये

हाथ अपने बढ़ाकर उम्मीद की किरण छूते हैं

खाक ए तमन्ना है तो क्या थोड़ा और जलते हैं


बुलंद इरादों से अपने सफ़र में चलते रहेंगे

जिंदगी के तपिश में भी हंसते मुस्कुराते रहेंगे

आज दिल ही दिल में कोई ख्वाब बुनते हैं

खाक ए तमन्ना है तो क्या थोड़ा सा और जलते 


माना कि हवा की रुख बहुत तुफानी है

पर रुक जाना तो हमारी ही नादानी हैं

आज हवाओं की रफ्तार को रोक देते हैं

खाक ए तमन्ना है तो क्या थोड़ा सा और जलते हैं


वैमनस्यता की हर दिवाल को तोड़ दें आज

अपने पन के गीतों को गाकर छेड़ें अपने साज

उसूलों की तितलियों को चारों ओर उड़ा देते हैं

खाक ए तमन्ना है तो क्या थोड़ा सा और जलते हैं



कोई फरियाद जमाने से अब करना नहीं

भरोसा हाथों की लकीरों पर करना नहीं

चलो "किरण"मुठ्ठी भर धूप ही समेट लेते हैं

खाक ए तमन्ना है तो क्या थोड़ा सा और जलते हैं

 ✍🏻✍🏻 स्वरचित मौलिक

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