"अपनो से अपनी बात"

संजय वत्स

भयावह कोरोना के इस मुश्किल वक़्त में जब चारों तरफ़ से रोज़ाना अप्रिय ख़बरें सुनने को मिल रही हों, ऐसे में दिन और तारीख़ कुछ भी ध्यान नहीं रहता,सुबह के बाद रात... रात के बाद फिर अगली सुबह... ऐसे मे अपना "जन्मदिन" भी कहाँ याद रहता है? उन सभी दोस्तों का शुक्रिया, जिन्हें शायद फ़ेसबुक के नोटिफिकेशन से पता लगा और उन्होंने वट्सएप्प और फेसबुक पर संदेश भेजकर मुझे जन्मदिवस की बधाई दी। 

आज मैने जीवन के 42बसंत पार कर लिये है।जीवन एक अनवरत चलने वाली प्रक्रिया है, साँसों का यह सफ़र इंसान को किस पड़ाव तक ले जाए यह निश्चित नहीं है! जब तक साँसें चल रही है जीवन है, सांसें रुकी की नहीं जीवन समाप्त समझो! लेकिन साँसों के रुकने से जीवन समाप्त नहीं होता हमें यह बात समझ लेनी चाहिए! हालाँकि इस जीवन के बारे में यह कहा जाता है कि :-

"पानी केरा बुदबुदा, 

अस मानस की जात ,

 देखते ही छुप जायेगा ज्यों तारा प्रभात!!"


किसी हद तक तो यह बात सही भी लगती है, लेकिन जब गहरे में उतरकर देखते हैं तो यह तथ्य उभरकर सामने आता है कि जीवन की तो सीमा है, लेकिन जीव की नहीं!जीव की यात्रा अनन्त है और जीवन की सीमित,जीव परमात्मा का अंश है, तो जीवन प्रकृति का!यह बात भी गौर करने योग्य है कि प्रकृति परमात्मा की छाया है और हम भी प्रकृति का एक अंश, यह भी सही है कि जिन तत्वों से जीवन का निर्माण हुआ है, जीवन की समाप्ति पर वह तत्व अपने-अपने मूल में मिल जाते हैं और फिर नव निर्माण होता है! यह प्रक्रिया अनवरत चल रही है सृष्टि के प्रारम्भ से, और चलती रहेगी अनंत काल तक!बस जीवन के प्रति अगर यही समझ बनी रहती है तो जीवन का सफर सुखदायी और आनंदमय बना रहता है, और हम साँसों के इस सफर को तय करते हैं पूरी संजीदगी के साथ. 

दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह परिवार की ओर से संजय जी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं बहुत बहुत बधाई

  *-आज जब मैंने जीवन के 42वर्षों का सफर तय कर लिया तो बहुत सी बातों के विषयों में सोचा और आंकलन किया खुद का, और खुद के कर्मों का बस यही कि जीवन जिस दिशा में जा रहा है और जिस गति से जा रहा है, अगर वही दिशा और गति बनी रहे तो भी कहीं न कहीं जीवन की सार्थकता सिद्ध हो जाए!-*

लेकिन इसके लिए मुझे बहुत संभल कर चलना है! क्योँकि इस संसार में खुद को पाक-साफ रखना बहुत कठिन कार्य है, लेकिन फिर भी कोशिश तो की जा सकती है और बस यही प्रयास अनवरत जारी रहता है! हालाँकि यह मानवीय स्वभाव है कि वह कभी भी एक सी चीजों पर केन्द्रित नहीं रहता और उसे रहना भी नहीं चाहिए, मन की चंचलता और बुद्धि की तार्किकता उसे जीवन भर संघर्षरत रखती है और मानव अपनी उपलब्धियों से खुद को गर्वित महसूस करता है! लेकिन यह बात हमेशा मेरे जहन में रहती है कि "क्षणिकता" से "वास्तविकता" की और बढ़ा जाए, अन्धकार से प्रकाश की ओर, अज्ञान से ज्ञान की ओर, भौतिकता से अध्यात्म की ओर अगर यह सब हो जाता है तो निश्चित रूप से जीवन मृत्यु से अमरत्व की ओर बढ़ जाएगा ओर जीवन का लक्ष्य सिद्ध हो जायेगा! लेकिन यह होगा तब ही जब हमारा-आपका सहयोग और प्रेम परस्पर बना रहेगा! 

इस आभासी दुनिया में आपकी प्रेरणादायी टिप्पणियाँ ही नहीं बल्कि समय -समय पर व्यक्तिगत रूप दिए गए आपके सुझाव भी मेरे लिए बहुत मायने रखते हैं।इसके अलावा आपका अपनापन तो मेरे लिए ईश्वर की सौगात से कम नहीं! इसलिए आज नतमस्तक हूँ आप सबके सामने! 

हालाँकि सूचना और तकनीक के इस दौर में आभासी रिश्तों की बात की जाती है और इसे एक तरह से आभासी दुनिया कहा जाता है, लेकिन मैंने जहाँ तक अनुभव किया मुझे काफी हद तक ऐसा प्रतीत नहीं हुआ!जिस भी व्यक्ति से आज बात हुई सबने सहयोग और प्रेम की ही बात की, माध्यम कोई भी रहा हो (टेलीफोन, फेसबुक, वट्सएप्प , मेल) आदि। लेकिन मैंने सबको सहयोग देते हुए पाया! इसलिए खुद को बहुत खुशनसीब समझ रहा हूँ, कभी-कभी दिमाग में एक बात आती है जिसका अकसर मैं दोस्तों को जन्मदिन की बधाई देते वक्त इस्तेमाल करता हूं वो ये की " हर जन्मदिन पर हम खुशी मनाते है लेकिन हर साल हमारी उम्र एक साल बढ जाती है, इसका मतलब हमारी ज़िन्दगी का एक साल कम हो गया और हमने मौत की तरफ़ एक कदम और बढा दिया"। ये बात नकारत्मक नही है ये सच्चाई है इसको भी हमें कुबुल करना होगा और वैसे भी मैं हर जन्मदिन पर यही सोचता हूं की शायद ये मेरी ज़िन्दगी का आखिरी साल है इसलिये जितने अच्छी तरह से जी सको जी लो, बगैर किसी को तकलीफ़ दिये, बिना किसी को परेशान किये, लोगो का दर्द और तकलीफ़ बांटकर जियो..यही मेरी ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा है..अगर इसको गाने की शक्ल दी जाये तो ये कुछ इस तरह बनेगां...

➰➰➰➰➰➰


-किसी की मुस्कराहटों पे हो निसार,

किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार,

किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार,

जीना इसी का नाम है!


माना अपनी जेब से फ़कीर है,

फिर यारों दिल के हम अमीर है,

माना अपनी जेब से फ़कीर है,

फिर यारों दिल के हम अमीर है,

मिटें जो प्यार के लिये वो ज़िन्दगी,

जले बहार के लिये वो ज़िन्दगी,

किसी को हो ना हो हमें ऎतबार,

जीना इसी का नाम है.....


रिश्ता दिल से दिल के ऎतबार का,

ज़िन्दा है हमी से नाम प्यार का,

रिश्ता दिल से दिल के ऎतबार का,

ज़िन्दा है हमी से नाम प्यार का,

के मर के भी किसी को याद आयेंगें,

किसी के आसुओं में मुस्करायेंगे,

कहेगा फ़ुल हर कली से बार-बार,

जीना इसी का नाम है....


किसी की मुस्कराहटों पे हो निसार,

किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार,

किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार,

जीना इसी का नाम है!

➰➰➰➰➰➰

 

 अब तो लगता है कि जीवन का सफर एक नए दौर की तरफ चल पड़ा और यह दौर और यह रिश्ते मुझे जरुर कोई नया मुकाम देंगे! आज अपनो के निश्चल प्रेम व दिल को छू लेने वाले मिले "संदेशों" से मैं नि:शब्द हो गया हूँ। 

दिल से जुड़े कई मित्रों, शुभचिंतकों, रिश्तेदारों ने फोन और संदेश द्वारा अपनी शुभकामनाएं प्रेषित कीं। मैं उन सभी के प्रति प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से आभार प्रकट करता हूँ, आशा करता हूँ भविष्य में भी आपका स्नेह यूँ ही बरसता रहेगा।

   और अंत में.... आप सभी से अनुरोध है कि सभी परमपिता परमेश्वर से दुआ करें कि भारत कोरोना नामक इस महामारी से जल्दी उभरे। सभी अपनी जिंदगी सकून से जी सकें, अपनों के साथ जी सकें। जिन्होंने अपनों को खोया है, उनके दर्द को भी समझें। सभी के स्वस्थ रहने की कामना करें। मेरे लिए जन्मदिन का यही अनमोल तोहफा होगा।

    पुनः आप सभी का आत्मीय आभार।


✒ संजय वत्स

    रूडकी, {हरिद्वार}

        [उत्तराखंड]

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