कवियत्री नंदिनी लहेजा की रचनाएं

  


प्राकृतिक आपदा

आधुनिकता की दौड़ में मानव भागा सा है जा रहा

प्रकृति मिली हमें जो भेंट ईश की ,

खिलवाड़ है उससे कर रहा

हरियाली को बदले बंजर में ,जंगल हो गए मैदान

जल को रोके बांध बना कहीं तो, कहीं',नदियों का बदले स्थान'

पर ना सोचे हम मूरख मानव ,इसका परिणाम है क्या हो सकता

कहीं भूकंप,कहीं बाढ़,कहीं अकाल तो कहीं जलजला,

 इस सृष्टि का विनाश है कर सकता

जंगलों के काट जाने से,वन्यपशु भटक आबादी की तरफ आते

उत्पात मचाते है हर तरफ,जनमानस को हानि पहुंचाते

धाम शिवा का केदार नाथ,क्या भूल पाएंगे वह त्रासदी

व्यवसायीकरण कर दिया था पुण्यस्थल का बदले में हुई अकल्पनीय बर्बादी

क्यों हम मानव लालच के अंध में इतना खो जाते है

यह धरती मैया है अपनी,बंजर इसको करते है

माना शहरी करण जरुरी ,पर खेत ही ना हुए तो क्या

मैया हो जाएगी बंजर तो हम अन्न खाएंगे क्या

हम सोचते पहाड़ों की गोद में शहरों को बसाएंगे

पर जब होगा भूसंख्लन तो लापता हम हो जाएंगे

हम ना कहते विकास करो मत ,पर कुछ सीमा करो निर्धारित

न हो नाराज प्रकुर्ति हमसे,और हम भी करें देश को विकसित


 एक डॉक्टर का जीवन 


एक डॉक्टर का जीवन तो,

सेवा का दूजा नाम ही है 

इनको कहते रूप ईश्वर का,

 नवजीवन जो हमें देते है 

महामारी के इस संकट में,

जब चहु और हाहाकार मचा 

बिन किये प्राणों की चिंता,

कर्मपथ पर स्वयं को अडिग रखा 

इक सैनिक सा जीवन है जिया,

 इस काल में हमारे डॉक्टर्स ने 

भूले परिवारों को अपने, 

सेवा की सरहद से खुद को डिगने दिया 

है शत नमन हमारा इन्हे ,और दिल से अभिनन्दन 

है धन्य हमारे डॉक्टर्स जिनके अथक परिश्रम से 

सुरक्षित हो रहा हमारा वतन 


स्वरचित मौलिक 

नंदिनी लहेजा 

रायपुर(छत्तीसगढ़)

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