कोरोना का लोगो के दिमाग पर मानसिक प्रहार

 

अग्रणी प्रिया

एक अनुमान के अनुसार विश्व की लगभग एक बड़ी जनसंख्या इस कोरोना नामक आपदा के कारण मनोविकार से जूझ रही है। 

जिस प्रकार से पिछले 2 वर्ष से हम सब को कैद पंक्षी 

की तरह पिंजरे (घरो) मे कैद रहना पड़ रहा है, मानसिक दबाओ का उत्पन्न होना जायज़ है।। 

बच्चो को 5 से 6 घंटे तक लगातार ऑनलाइन क्लासेस के लिए मोबाइल, टैब, या लैपटॉप के सामने बैठना पड़ता है । इतने के बावजूद उन्हे रिहाई नही मिलती , होमवर्क, प्रोजेक्ट , और न जाने कितनी गतिविधिया उन पर थोप दी जाती है। 

और इतना सब कुछ करने के बाद अगर उन्हे एक-आद घंटे सुकूँ से बाहर खुली हवा मे साँस लेने न मिले, 2-4 दोस्तो के साथ दौड़-भाग न कर सके तो उनका मनोविकार पैदा होना स्वभाविक है। 

अगर बात करे हम युवापीढ़ी की तो हम सब इस बात से अवगत है की उन्हे अपनी ज़िम्मेदारी, भवीष्य और अपनी ख्वाहिश के लिए कितना लड़ना पड़ता है। जीवन का ऐसा पड़ाओ जब वो पूरी दुनिया का अन्वेषण करना चाहते हो और उन्हे चौबिसो घंटे चार दिवारी के अंदर बंध कर रहना पड़े तो हम अनुमान लगा सकते है उन्हे किस परिस्थिति का सामना करना पड़ रहा होगा। 


बीते कुछ दिनो से अस्पतालो के बाहर से आने वाली लोगो की चीख़, ऑक्सीजन एवम् बेड की कमी, कराहते परिज़न और जलती लाशें, आजकल ये दृश्य सुनने और देखने मे इतना आम हो गया है जो हमने कभी सपने मे भी नही सोचा था।। ये सूचनाएं सिर्फ़ सूचनाओं की तरह नहीं बल्कि डर बनकर भी हमारे दिमाग़ में जा रही हैं।। एथिक्स एंड मेडिकल रिजस्ट्रेशन बोर्ड के अध्यक्ष बीएन गंगाधर सहित मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े अन्य डॉक्टरों ने एक खुला पत्र लिखकर ये मसला उठाया है। 


28 अप्रैल को लिखे गए इस पत्र में मीडिया कवरेज में दिखाए जाने वाले मरीज़ों, अस्पतालों और श्मशान घाटों के विज़ुअल के मानसिक स्वास्थ्य पर असर को लेकर आगाह किया गया है। 

उस पत्र मे लिखे गए कुछ तत्वो पर आपका ध्यान केंद्रित करना चाहूँगी। 

उस पत्र मे लिखा गया है:- "श्मशान में जलते हुए शवों की तस्वीरें, मृतक के रोते हुए रिश्तेदार, भावनाओं का विस्फोट और उनके आसपास मौजूद पत्रकारों व कैमरापर्सन का झुंड, इससे लोगों का ध्यान तो खींचा जा सकता है लेकिन ऐसी कवरेज के गंभीर परिणाम भी होते हैं। महामारी में लगी पाबंदियों और दिशानिर्देशों के कारण लोग सामान्य जीवन नहीं जी पा रहे हैं. उनमें पहले ही मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएं आ रही हैं. लोग घरों में हैं और ऐसे में वो टीवी और सोशल मीडिया ज़्यादा देखने लगते हैं. लेकिन, जब वो ऐसे परेशान करने वाले और दुखभरे विज़ुअल देखते हैं तो उनका दुख और गहरा हो जाता है। 

पत्र में लिखा है कि इस मुश्किल समय में संवेदनशील मसलों पर रिपोर्टिंग करना आसान नहीं होता। आप जो ख़बर दिखा रहे हैं अगर वो आपको इतना प्रभावित करती हैं तो देखने वालों पर इसका क्या असर होता होगा।ये कोई नहीं जानता कि ख़बर देखने वाला कौन-सा व्यक्ति किस मानसिक स्थिति में है. जिन लोगों में सक्रमण कम है और वो घर पर ठीक हो रहे हैं तो क्या एक सकारात्मक माहौल उन्हें ठीक होने में मदद नहीं करेगा। "


इस पत्र से ये साफ़ ज़ाहिर होता है की इस परिस्थिति और नकारात्मक विचारो के कारण मानव जाति पर एक गहरा प्रभाव पड़ रहा है।। परिस्थिति को बदलना हमारे हाथो मे नही है पर किन विचारो, किन समाचारों को फैलाना है ये हमारे हाथो मे है।। 

जितना हो सके सकारत्मकता फैलाय, और एक दूसरे के लिए शरीरिक रूप से उपस्थित रहे या न रहे मानसिक रूप से साथ निभाने का पूर्णतः प्रयास करे। 

_अग्रणी प्रिया_

_आरा, बिहार_

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