अलगू जुम्मन दोस्त ना रहे

श्रीकांत यादव

सरे रात मेरे सपनें ने, 

ले ली करुण उडान! 

पंचपरमेश्वर के कुछ पात्र,

रहने आ गए हिंदुस्तान! 


एक दिन अचानक बाजार में, 

अलगू से जुम्मन टकराए! 

दोनों अगल बगल झांकते, 

हां मिलने से बहुत घबराए! 


ना तो अलगू ने की नमस्ते , 

ना ही जुम्मन किए सलाम! 

थी बड़ी संख्या में जनता, 

और बहुतायत में आवाम! 


शिकायती नजरें दोनों की, 

आंखें दोनों की करें सवाल! 

कब के मोहल्ले अलग हुए, 

लेकिन थमता नहीं बवाल! 


टीका अलगू के माथे सोहे, 

जुम्मन सिर टोपी जालीदार! 

रहती दंगे की वहां आशंका, 

खड़े रहते सिपाही पहरेदार! 


लंबी चुप्पी तोड़ अलगू बोले, 

तूं शरियत बहुत सिखाता है! 

मुफ्त माल अपनी खाला का, 

क्यों तूं झांसा देकर खाता है! 


चिढ़़कर शेख जुम्मन बोले, 

बड़े धर्मात्मा कहलाते हो!

उधार में बीमार बैल बेचकर, 

समझू घर पंचायत बैठाते हो! 


बढ़ा क्रोध तो अलगू दहाड़े, 

उस वक्त हिंदुत्व सोया था! 

फिर भी खाला वाले फैसले से, 

तूं कितना जार जार रोया था! 


बैल वाले पंचायत में की गलती, 

खामखां पंचपरमेश्वर बन बैठा! 

करवा दिया होता जेल जुर्माना, 

तो तूं न घूमता ऐंठा ऐंठा! 


बात बिगड़ गई तनिक देर में,

 समझू अलगू को मोटा दिए डंडा!

खाला कुल्हाड़ी दीं जुम्मन को, 

गाढ़ी दोस्ती का ऐसे फूटा भंडा! 


सामाजिक समरसता की चूल हिली, 

समय रहते स्नेह के पौधे रोपें! 

न अलगू पक्ष के तलवारें भोकें ,

जुम्मन पक्ष के न चाकू घोपें! 


माहौल बिगड़ा है समाज का, 

अब अलगू जुम्मन टकराते हैं! 

यदुवंशी सच्ची दोस्ती में फूट डाल,

कुछ राजनीति की रोटी खाते हैं! 


(श्रीकांत यादव!)

प्रवक्ता हिंदी

आर सी -326, दीपक विहार

खोड़ा, गाजियाबाद

उ०प्र०!

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