कैसे कहें अलविदा..….

 



मीनाक्षी सुकुमारन

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4 मई 2021 एक ऐसा दिन जिसे कभी भी याद रखना नहीं चाहेंगे क्योंकि इस दिन एक ऐसे अपने को छीन लिया जो बेहद ही नेक, हँसमुख, ज़िंदादिल, बिंदास, अपनत्व से भरे हुए, सबके दुख दर्द में सबसे आगे खड़े रहने वाले और ज़िन्दगी को भरपूर जीने वाले हम सबके बेहद ही प्रिय और अपने पवन अरोड़ा जी को हम से जुदा कर दिया।

उनसे पहली मुलाकात सम्मान समारोह में हुई थी एक अजनबी की तरह। फिर दो से तीन बार समारोहों में औपचारिक सी मुलाकात हुई। पर उनमें कुछ ऐसा था की जो भी एक बार उनसे जुड़ जाए उनसे अलग नहीं हो पाता था। बेहद ही प्यार भरा स्वाभव और दिल के एकदम साफ। यही बात ने सबसे ज़्यादा आकर्षित किया हमें। फेसबुक पर मित्र बने, व्हाट्सएप पर जुड़े उन्हें पढ़ना का मौका मिलता। उनकी प्रतिक्रिया भी मिलती हमें अपनी रचनाओं और पोस्ट पर। इस बीच ऐसा अवसर आया की हम सबके बेहद ही खास अशोक अरोड़ा जी के निर्धन की खबर आई जिस से हम सब हिल गए।

उनसे व्हाट्सएप पर बात हुई की आप जा रहे हैं क्या उनके घर, उन्होंने पूछा आपको जाना है। हमने कहा जी जाना तो है पर मेरठ अकेले कैसे और बेटे का स्कूल पति का ऑफिस रहता है तो शनिवार या इतवार में ही जा सकते हैं।  उन्होंने अच्छा देखते हैं बताते हैं। फिर एक दो दिन बाद उनका संदेश आया जाने का प्रोग्राम बन गया है आप घर पर आ जाना फिर हम लोग मिल के चले जायेंगे। हमने कहा हम नोएडा से आएंगे तो कहीं बीच में मिल जाएं। फिर उन्होंने कहा यूँ कहीं अकेले कहीं बीच में मिलना या आना सही नहीं आप घर पर आ जाना वहीं से सब चलेंगे।

प्रोग्राम बन गया हमारे साथ नीरजा मेहता जी भी जाने वाली थीं इसलिये निश्चिंत थे जाने की घबराहट नहीं थी। पर जिस दिन जाना था उस से एक दिन पहले कुछ एमरजेंसी आ गई और उनका जाना टल गया। अब क्या करें जाना भी था, झिझक और डर भी था। क्योंकि दिल में था जाना ही है इस दुःख की घड़ी में अशोक जी के घर तो निश्चित दिन हम उनके घर पहुंच गए। वहां पहली बार उनकी पत्नी से मिलना हुआ और चाय पानी, नाश्ता सब कराया उन्होंने। तब तक वहां केदारनाथ मसीहा जी भी आ गए और ऋषि अग्रवाल पहले सी था। फिर सब निकल चले मेरठ के लिए और बीच में अरविंद योगी भी जुड़े। सफर लम्बा था इस बीच सब बातचीत करते रहे तभी पवन जी ने कहा मीनाक्षी डर तो नहीं लग रहा हम सबके साथ इतनी चुपचुप हो। सफर है लंबा बात वात करो। माना हम दुःख में शामिल होने जा रहें हैं पर इस तरह घबरा या चुप मत बैठो। पूरे माहौल को इतना सहज बना रखा था उन्होंने कार ड्राइव करते हुए।

बीच में उन्होंने बताया सिर्फ आपके लिए ये प्रोग्राम बदला वरना हम सब तो उनकी तेरहवीं पर जाने वाले थे। आपका मन था और आपने इतनी हिम्मत दिखाई साथ चलने की कैसे मान न रखते आपकी बात का।

मेरठ पहुँचे काफी लंबी ड्राइव थी पवन जी कार तो चला ही रहे थे सभी का पूरा ख्याल भी रख रहे थे। अशोक जी के घर पहुंचे उनकी पत्नी, उनकी  बेटियों, उनकी वृद्ध माँ से मिलना हुआ। बेहद ही तनाव हो रहा था। मन दुःखी भी था। सामने उनकी तस्वीर लगी हुई थी ऐसा लग रहा था जैसे अभी वो किसी कमरे से बाहर आएंगे और कहेंगे "आखिर मीनाक्षी तू मिलने आ ही गई" पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। और हम सब कुछ देर रुककर अपनी श्रंद्धाजलि देकर वापिस दिल्ली के लिए चल पड़े। सब भावुक और गंभीर थे। तब भी पवन जी ने सब का मन हल्का किया अपनी बातों से। फिर रास्ते में एक जगह रुककर सब ने खाना खाया जिसके उन्होंने किसी से पैसे भी नहीं लिए। हम हसरत भरी निगाहों से पान के स्टाल को देख रहे थे , तभी पवन जी ने देख लिया पूछा खाना है क्या पान? हम ने झेंपते हुए कहा अकेले कैसे अगर सब खाएंगे तो। तभी उन्होंने केदार जी से पान के लिए कहा और केदार जी सबके लिए उनके मन मुताबिक पान ले आये। उसके बाद उन्होंने अपने मनपसंद गीत चला दिए बेहद ही खूबसूरत कलेक्शन पुराने क्लासिक गीतों की एक से एक बढ़कर। दिल्ली तक का सफर कैसे तय हो गया पता भी नहीं चला पर अंधेरा होने लगा था। दिल्ली पहुंचने ही वाले थे उनके घर से फोन आया तो पवन जी चाय और समोसों का इंतज़ाम करने के लिए कहा। क्योंकि रात हो रही थी हमने उनसे कहा प्लीज़ अब घर नहीं जा पाएंगे हमें नोएडा जाना है काफी देर हो गयी है बेटा भी घर में सुबह से देख रहा होगा। वह तुरंत बोले मैं समझता हूँ आप कैब बुक करा लो गेट पर ही उतार देंगे आपको। उनकी सोसाइटी जैसे ही पहुँचे कैब आने  में समय था तो केदार जी को साथ उतार दिया और कहा टैक्सी में चढ़ा कर ही आना और साथ ही कहा घर पहुँचते ही फोन ज़रूर कर देना संभल कर जाना। 

और हम जैसे ही घर पहुँचे और फोन करते उन्हीं का फोन आ गया ठीक से पहुँच गयीं कोई परेशानी तो नहीं हुई न। 

इस तरह ये सफर उस प्यारे से सफर की शुरुआत बनी जिसमें उन्होंने बहुत स्नेह और अपनापन दिया। उनकी हँसी, मस्तमौला अन्दाज़, बेफिक्री सबको कायल कर देती। जितनी बार भी किसी भी समारोह या पुस्तक मेले में उनसे मिलना हुआ बेहद ही अपनापन लगता। हमारी खुशकिस्मती रही जब हमारी पहली पुस्तक "अहसास ए अल्फ़ाज़" का गांधी प्रतिष्ठान में लोकार्पण हुआ पवन जी उपस्थित थे। फिर नीरजा मेहता जी पर ट्रू मीडिया अंक का नीरजा जी की सोसाइटी में लोकार्पण हुआ जिसमें हमने पहली बार किसी सार्वजनिक समारोह में  माइक संभाला बतौर उदघोषक तब भी पवन जी उपस्थित थे। उस समारोह के बाद हम ने उनसे व्हाट्सएप पर पूछा "कैसा किया हमने"। उनका जवाब "आया पगली कमाल किया तूने अब जब मेरी पुस्तक का लोकार्पण होगा तब भी तुझे ही करना होगा, कोई बहाना नहीं चलेगा देख मैं कह देता हूँ"।

हमने भी कहा वादा इस बार मिस नहीं होगा क्योंकि हमारी बदकिस्मती रही उन्होंने दो बार हमें बुलाया एक उनकी पुस्तक के लोकार्पण पर दूसरा उनकी शादी की 25वीं सालगिरह पर और किसी न किसी कारण हम दोनों में ही नहीं जा पाए। 

फिर भी ये रिश्ता परवान चढ़ता रहा उनके स्नेह और अपनेपन में कोई कमी नहीं आई। हर सुबह के गुडमार्निंग संदेश से, शादी की सालगिरह हो, जन्मदिन, कोई भी त्योहार संदेशों और फोन पर बातचीत होती रही। एक पारिवारिक रिश्ता सा बन गया था उनके और उनकी पत्नी दिव्य जी के साथ। फिर वक्त ऐसा आया हमारी तबियत काफी खराब हुई कई दिन हस्पताल में रहे और उनका बराबर संदेश आता "साईं सब ठीक करेंगे तू बिल्कुल चिन्ता मत कर"। जब घर आये तब भी उनका संदेश "पगली ऐसे मत डराया कर ख्याल रखा कर अपना"।

उसी बीच ट्रू मीडिया के हम पर अंक की बात चल रही थी तब उनसे हमने हमारे लिए एक पृष्ठ लिखने के लिये आग्रह किया तो खुशी से बोले "पगली ये तो मेरा सौभाग्य होगा"। और उन्होनें बड़े ही मन से हमारे लिए लिखा एक पृष्ठ। फिर जब तय हुआ उसके विमोचन का दिन तब भी हमने झेंपते हुए पहले उन्हें संदेश फिर फोन किया "सॉरी हम जानते हैं आपने दो बार बुलाया और हम दोनों बार नहीं आ पाए प्लस क्या आप दिव्या जी के साथ आएंगे"। वो हँस कर बोले पगली ज़रूर आएंगे। और सौभाग्य रहा पवन जी दिव्या जी के साथ आये और मुकेश दुबे जी उनकी पत्नी सपना जी के साथ, केदार जी, गुलशन प्रेम भी। सब साथ उनकी ही कार में आये थे। वो पल बेहद ही सुखद था जब उस खास दिन सब हमारे साथ थे। उसके कुछ समय  बाद फिर गहरा झटका लगा हमारी तबियत बिगड़ी और पता चला हमारी दोनों लंगस आधी आधी खराब हो गईं हैं और कई दिन हस्पताल रहे और महीनों इंजेक्शन, स्टेरॉयड चले पर पवन जी का संदेश रोज़ आता रहा "साईं सब ठीक करेंगे बस तू चिंता मत कर"। हमेशा संदेश पर फोन पर हिम्मत बंधाते रहे। कई महीनों तक  लगातार इलाज चला जो आज तक चल रहा है। "पर अब कौन हिम्मत देगा, कौन कहेगा पगली मस्त रहा कर, चिंता मत करा कर", खुश रहा कर। 

वो खुशियों के पल , संदेश ,साथ , हँसी , बातें , मेल मिलाप आज बस तस्वीरों में कैद हो कर ही रह गयीं है आपके यूँ चले जाने से। जाने तक आप यही कहते रहे जल्द मिलेंगे, साथ हँसेंगे, पढ़ेंगे, पढ़ायेंगे.....फिर क्यों यूँ चले गए आप इस तरह अचानक यूँ स्तब्ध ,असहनीय, रोता हुआ छोड़ की कहते भी नहीं बन रहा भावभीनी श्रद्धांजलि।। उस हँसी की खनक, प्यार अपनेपन को कैसे कहें ...अलविदा।।

....मीनाक्षी सुकुमारन

      नोएडा

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