निरपेक्ष

 लघुकथा

ममता शर्मा "अंचल"

अब क्या लिखा है पत्र में तेरी मैम ने? ओह! पत्र नहीं मैसेज में? पत्रों के जमाने अब कहां रहे! मैसेज आते-जाते हैं अब तो मोबाइलों में । मुझे मोबाइल में कुछ पढ़ते देख एक उचटती सी दृष्टि मेरे मोबाइल पर डाल, बहन बोली। उनकी बात को अनसुनी सी करती हुई मैं उनकी लिखी चार पंक्तियों----- “तिनका चुनचुन घरौंदा बनाया, दोनों ने मिल संसार बसाया; कीट पतंगे लाए खिलाया, पंख उगे उड़ना सिखाया। निरपेक्षता मुझे पाठ पढ़ाया।। 


           डूबी रही कुछ पलों तक पंक्तियों में, सोचती हुई --क्या लिखूं ?इतने में ट्रे में दो कप चाय लेकर मां आ बैठी मेरे पास, बहन को कहते हुए “बेटा तनिक दूध देख लेना,उफन न जाए! गैस पर रख आई हूं मैं उसे।“ जी मां! उत्तर पाकर निश्चिंत सी हो अब वे मुझसे बोलीं “अरी ओ मेरी बावली पढ़ाकू! कहां लगे रहते हो तुम लोग इस खिलौने में ? ले अब शांति से पहले चाय पी ले। ऐसा वात्सल्य -सागर उमड़ रहा था उनके आदेश में कि मैं मना न कर ,उनके स्नेह आदेश का पालन करते हुए चाय का कप हाथ में उठा बोली “मां आप भी ना जाने कहां खटती रहती हो इस  सब में इस उम्र में भी? क्यों रखती हो इतना मोह? अब भी आप से निरपेक्ष नहीं हुआ जाता?


          क्या कहती है रे तू? यह मुझे कोई मोह वोह नहीं है । वह वहां होता है जहां कोई किसी से कुछ अपेक्षा रखता है। मुझे किसी से कोई अपेक्षा नहीं है।मैं तो सब कुछ निरपेक्ष ही रहकर करती हूं।मां हूं, पत्नी हूं, पुत्री हूं, बहन हूं; हूं सबके प्रति निरपेक्ष ही। मेरा तो प्रेम है सबके प्रति।इसलिए यह सब जितना बन पड़ता है करती हूं। उन लोगों की धारणा ही गलत है कि ये मेरे सहारे हैं।ना !!सहारा तो एक उसका है बस। वह प्रेममय है। प्रेम करना ही उस  का भजन है, उसे भजना है। मां !!!मैं आश्चर्य से मुंह बांए उनके मुख की ओर देखती रह गई। वे रुकी नहीं। फिर बोली – “बीज का बीज बन जाना ही तो बीज की मंजिल है। नदी का नदी, बादल का बादल, फूल का फूल,कली का कली, भोर का भोर, सांझ का सांझ बन जाना, बन पाना ही तो सभी की मंजिल है। पंछी मां-बाप को छोड़ उड़ जाते हैं। उडेंगे ही। हम को किसी ने बनाया। हमने किसी को बनाया। फिर जिस उद्देश्य के लिए बनाया, अब वही तो वे भी बनाएंगे ।बनाएंगे क्यों? अखंड अनादि,अनंत प्रेम पाश में बंध कर ।यही तो उनकी नियति है, यही कर्तव्य है ।प्रेममय, प्रेम रूप है परमेश्वर। वही आत्मा बनता है, परमात्मा बनने के लिए। यह प्रेम ही तो है जो  सब कुछ करता-कराता है सभी से। हम ही घोंसले के निर्माता हैं। हम ही उड़ जाने वाले हैं। प्रेम पाश से बंध कर। फिर उड़ जाने में निरपेक्षता कहां? प्रेम का स्वरूप ही सापेक्ष है। निरपेक्ष नहीं। निष्काम कर्म पथ पर अग्रसर होना है -उड़ जाना ।न मानें, न जानें बात अलग है ।

        अरे! मैं तेरे जितनी तो पढ़ी-लिखी तो हूं नहीं। बस कभी-कभी तेरे बाऊजी कुछ कुछ कहते रहते हैं। उसे ही मैंने दोहरा दिया है । अब चाय पी।ठंडी हुई जा रही है। मैं फिर कुछ पल मां के कथन में डूबी रह गई। मुझे मिल गया समर्थन  जो मैं चाह रही थी।निरपेक्षता? कौन है निरपेक्ष?  घोंसले के निर्माता या फिर पंख उगे उड़ जाने वाले? मेरे ख्याल में दोनों में कोई नहीं। वे तो अनादि, अनंत , अखंड प्रेम पंथ के पथिक हैं ।और हूं मैं उसी प्रेम पंथ की पुरानी पगली पथिक।


🙏🌹🙏ममता शर्मा "अंचल"

          अलवर (राजस्थान)

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