कवियित्री आराधना प्रियदर्शिनी की रचनाएं

 



*मुस्कान*


मौन होकर भी मृदुभाषी तू,

उमंग नई, आशा सी तू।


चाहे पहाड़ टूटा हो दुख का,

या हौसला डगमगाया हो,

लगने लगता है सब कुछ आसान,

जो मुख पर मुस्कान का साया हो।


चाहे कितनी भी बड़ी चुनौती हो,

चाहे डर हो कितना भी बड़ा,

चेहरे पर तेरी स्वर्णिम छींटे,

हर दुख, हर पीड़ा से लड़ा।


चाहे टूट गया हो मन,

हो हार गया तकदीर से,

फिर भी मुक्ति देती है बस एक मुस्कान,

वेदनाओं की जंजीर से।


हर दुख सुख में परिवर्तित हो जाता है,

मृदुलता और सम्मान से,

बेचैनी राहत में बदल जाती है,

एक मीठी सी मुस्कान से।


*पायल*


बस उसकी छम छम सुनते हैं,


वह हंसते हैं या रोते हैं,


उनकी भावनाओं से अनभिज्ञ,


हम उनके साथ ही होते हैं।



क्या कहती है यह छम छम,


क्या तुमने यह भी जाना है,


कितना बड़ा है त्याग किया,


गैरों को अपना माना है।



खुद के छम छम की ध्वनि से,


यह सब को खुश करती है,


यह लाखों के पैरों में,


ना जीती है ना मरती है।



ना सुख की इच्छा है इसे,


ना दुख का है कोई डर,


छम छम छम छम मीठी मधुर,


रहे ध्वनि यह सदा अमर।



यह रहती है हर शहर में,


यह रहती है हर गांव में,


ना धूप इसे तड़पाती है,


ना राहत मिलती है छांव में,


हमेशा चमकती है पायल,


बस लोगों के पांव में।



पायल पांव की शोभा है,


यह भी अनमोल गहना है,


सबका यह प्रिय सिंगार है,


और आगे क्या कहना है।



 इसका रूप है प्रिय आकर्षक,


 इसका अलग सम्मान है,


 यह प्रसिद्ध मशहूर आभूषण है,


 यह अपनी जगह महान है।



सबका आकार ही देखकर,


हम गहनों को जानते हैं,


पर इसकी मीठी छम छम से ही,


हम पायल को पहचानते हैं।



पायल और घुंगरू साथी है,


हर बात साथ यह कहते हैं,


प्रेरणा देते हैं एकता का,


आजीवन साथ ही रहते हैं।



आराधना प्रियदर्शिनी

स्वरचित एवं मौलिक 

बेंगलुरु 

कर्नाटक

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