कंजूस

 दिनांक 02। 11। 2020

  लघु कथा

गीता पाण्डेय 'अपराजिता'

राधा एक बहुत ही सीधी-सादी लड़की थी उसका विवाह एक अच्छे घराने में हुआ उसके पति नौकरी करते थे और घर पर वह सब पैसे भेज देते थे उनकी मां ही घर के खर्च चलाती थी पर वह बहू को कभी उसके जरूरत का सामान लाकर नहीं देती थी वह कभी कुछ बोलती भी नहीं थी।

       कुछ दिन के बाद छुट्टियों में उनके पति आए तो राधा के मायके में निमंत्रण था तो सब लोग जाने के लिए तैयार हुए राधा भी तैयार हुई तो उसकी सांसों ने एक पुरानी साड़ी निकाल कर उसको पहनने को दिया जब राधा और उसका पति रवि वहां पहुंचे तो सब आपस में बात करने लगी कि यह तो वही साड़ी है जो हमने इनके सांसों को भिजवाई थी राधा का पति झेंप गया।

       वहां से वापस आने पर उसने मां से बात की और कहा मां मैं इतने रुपए आपको कमा कर देता हूं और आप इतनी कंजूसी करती हैं कि राधा को ढंग के कपड़े भी नहीं लाकर देती हैं ऐसा व्यवहार करना ठीक नहीं है और मां को कंजूस समझ कर रवि उस दिन राधा को बाजार लेकर गया और उसके पसंद के कपड़े व उसके रोजमर्रा की जरूरतों का सामान उसे खरीद कर दिया जिससे राधा बहुत खुश थी पर उसके सासु को यह अच्छा नहीं लग रहा था कि इतने पैसे आज खर्च हो गए क्योंकि वह बहुत ही कंजूस थी और पैसे जोड़ जोड़ कर रखती थी ढंग से खाती पीती नहीं थी जबकि रवि को यह सब अच्छा नहीं लगता था रवि ने सख्त हिदायत मां को दी कि आप यह कंजूसी करना छोड़ दो।


गीता पाण्डेय अपराजिता

 रायबरेली उत्तर प्रदेश

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