मजदूर जीवन तेरी यही कहानी

सतेन्द्र शर्मा 'तरंग' 

जमाना महलों में बैठा अकुला रहा, 

मजदूर सड़कों पर छटपटा रहा। 

जमाना घर को कैदखाना समझ रहा, 

मजदूर घर की ओर चला जा रहा।। 


पेड़ से टूटी डाली की तरह, 

बिखरा तिनका-तिनका वो।

माला सा पिरोये जो देश को, 

छिटका मनका-मनका वो।

कल तक जो अर्थव्यवस्था की रीढ़ था, 

आज वो दाने-दाने को तरसा जा रहा।

बोझ जिन्दगी पर गरीबी का सहकर, 

मजदूर सड़कों पर छटपटा रहा।। 


कभी लाठी कभी गाली कभी गोली, 

तरसा सुनने को एक प्रीत की बोली।

पेट की खातिर जिस शहर में बसा, 

आज वही शहर उसे ठुकरा रहा। 

मजदूर कल भी बेबस था आज भी बेबस है, 

कर्मयोद्धा जैसे जीवन हारा जा रहा। 

मौन है हुक्मरां बैठे आंखे बन्द कर,  

मजदूर सड़कों पर छटपटा रहा।। 


ना मांगा उसने सोना-चांदी, 

करे आस बस दो रोटी की। 

देखो बिलखते बच्चे भूखी मां, 

देखो शरीर से निकलती जां। 

चलते चलते पड़े पैरों में छाले, 

आस में गांव के घर की चला जा रहा। 

मरते हुए सपनों का बोझ लेकर, 

मजदूर सड़कों पर छटपटा रहा।। 


मजबूरी, लाचारी बने मजदूर के पर्यायवाची, 

कसूर क्या जो झेली पलायन की त्रासदी। 

हवाई वादों की भरमार देख रहे मजदूर, 

रोता है मन देख उसे जो सहे मजदूर। 

नंगे पांव मंजिल की तलाश कर रहा, 

जीवन की आस में पल-पल मर रहा। 

अपने ही कांधों पर लाश अपनी लेकर, 

मजदूर सड़कों पर छटपटा रहा।। 


चाह नहीं उसको हवाई उड़ानों की, 

चाह नहीं उसको आसमानों की। 

अपनी जमीं का प्यार मिल जाये बस, 

कुछ ऐसा करो थकान मिटे तन-मन की। 

सूनी आंखों में आस का पहान ढो रहा, 

मन में जिजीविषा के स्वप्न बो रहा।

ताली बजाने वाले हाथ गिरे हैं टूटकर, 

मजदूर सड़कों पर छटपटा रहा।। 


मन व्यथित है मजदूर की दशा पर, 

मन द्रवित है रेल पटरी की क़ज़ा पर। 

पैदल चलना भी हुजूर ने अब अपराध कहा, 

राशन की लाईन में लाठी का प्रहार सहा। 

नीति नियन्ता बांटें घोषणाओं का रस, 

कागज की कश्ती में सफर तय कर रहा। 

फिर एक भगीरथ की प्रतीक्षा में रहकर, 

मजदूर सड़क पर छटपटा रहा। 


जमाना महलों में बैठा अकुला रहा, 

मजदूर सड़कों पर छटपटा रहा। 

जमाना घर को कैदखाना समझ रहा, 

मजदूर घर की ओर चला जा रहा।। 


**सतेन्द्र शर्मा 'तरंग' 

११६, राजपुर मार्ग, 

देहरादून ।

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