परशुरामायण ,मात्र कथा काव्य नहीं, ऐतिहासिक तथ्यों का विश्लेषण है

 अक्षय तृतीया भगवान परशुराम जयंती पर विशेष -

डॉ अनिल शर्मा'अनिल'

सप्त चिरंजीवी में भगवान परशुराम की गणना होती है । मान्यता है कि महेंद्र गिरी पर्वत पर आज भी रहते है। उनकी कृपा का फल है कि महात्मा विदुर की तपस्थली जनपद बिजनौर की पावन धरा के अंग,बाबा कालिया नाथ,परमसंत पानपदास, गुरु होरी महाराज की तपस्थली, स्वामी भागवतानंद की साधना स्थली धामपुर की पवित्र माटी के सपूत विद्वान पंडित गौरीशंकर शर्मा सुकोमल जी ने भगवान परशुराम जी के जीवन चरित्र को लेकर 

" परशुरामायण" के रुप में ऐसे ग्रंथ की रचना की जो भगवान परशुराम के जीवन चरित्र पर विस्तृत प्रकाश डालते हुए, उनके कार्यों और उनकी महानता को पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करता है। 

यह काव्य ग्रंथ, अनूठा है क्योंकि इसमें प्रमाणिक रूप से पौराणिक व ऐतिहासिक घटनाओं का विश्लेषण करके तथ्यात्मक कथा प्रस्तुत की गई है, जो तर्क की कसौटी पर भी खरी उतर रही है। कवि जिस नायक को लेकर काव्य की रचना करता है, उसकी विशेषताओं को प्रकट करना ही उसका लक्ष्य होता है।साथ ही अपने नायक के संबंध में प्रचलित भ्रांतियों का निवारण करना भी होता है। 

"परशुरामायण" पंडित गौरीशंकर सुकोमल जी का ऐसा ही एक विनम्र प्रयास है जैसा कि उन्होंने ग्रंथ के शुरू में मेरी बात शीर्षक के अंतर्गत स्वयं ही लिखा है कि - हालांकि मैं ना तो कोई प्रतिष्ठित कवि साहित्यकार हूं, फिर भी मैंने इसे कथावाचन का उद्देश्य लेकर काव्य के रूप में रचने का प्रयास किया है। 

श्री सुकोमल जी के काव्य ग्रंथ का आधार है, डॉ डी आर शर्मा की प्रेरणा से लिखित शोध ग्रंथ 'भगवान परशुराम गाथा' जिसकी स्वीकारोक्ति भी मेरी बात में की गई है। सुकोमल जी ने शोध ग्रंथ को काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत कर दिया हो ऐसा नहीं है उन्होंने विभिन्न पुराणों वह पूर्व में परशुराम जी पर रचित काव्य पुस्तकों व इतिहास को भी पढ़ा तथा विश्लेषण किया तब इस "परशुरामायण" की रचना की। 

कुल 12 सर्गों में प्रस्तुत परशुरामायण को 224 शीर्षकों में विभक्त किया गया है। प्रभु के प्रारंभिक अवतारों में पूर्ण मानव अवतार छठे अवतार भगवान परशुराम ही है। उनके जन्म से लेकर महाभारत काल तक परशुराम जी की कथा इस काव्य ग्रंथ में है। परशुराम की लीला उनसे जुड़े स्थलों के चित्र इस ग्रंथ की शोभा बढ़ा रहे हैं ।

विभिन्न ग्रंथों और रचनाकारों जैसे महाकवि तुलसीदास, सूरदास ,कवि रसाल, रामधारी सिंह दिनकर, श्याम नारायण पांडे, हृदयनाथ शास्त्री, चंद्र मोहन पांडे रुद्राक्ष, श्री कृष्ण राय हिरदेश, दिनेश भार्गव,दाताराम जी, डॉ बृजेंद्र अवस्थी, रामचंद्र शर्मा शास्त्री, गोमती प्रसाद विकल आदि की चर्चा करते हुए पं राधेश्याम शर्मा बरेली वालों की शैली में इसकी रचना की।शोध के रूप में परशु रामायण में प्रथम बार तथ्यात्मक रूप से कुछ विशेष तथ्यों की चर्चा की गई है 

- जैसे परशुराम जी द्वारा ही रामेश्वरम की स्थापना सहित भारतवर्ष के विभिन्न स्थलों पर द्वादश ज्योतिर्लिंग की स्थापना करना अमरनाथ में बर्फ के शिवलिंग की स्थापना करना और यह की रामगंगा नदी का अवतरण भगवान परशुराम द्वारा ही किया गया।

 भगवान परशुराम की कार्य भूमि विस्तृत है। संपूर्ण आर्यवर्त में पड़ोसी राज्यों में इनकी महत्ता थी। जैसे -

भाषा विज्ञान के अनुसार,भृगु,फ्रगिया राज्य निवासी थे/ भृगु का अपभ्रंश हुआ फ्रगिया,जो मध्य एशिया वासी थे /अपिशल भृगुओं का गोत्र नाम, जो सीरिया सूर्या नगर बना /नडायम गोत्र ऐनाम मुंड जो नाडि नामक नगर/ टर्की में टेबुल लैंड टीला, शुक्राचार्य गुरु द्वारम् था/ भार्गव थे शिव जी के पूजक, यह नाम उन्हीं के कारण था/ महर्षि प्रभु के कारण ही, बगदाद नाम विख्यात हुआ/ ईरानी भाषा में भृगु को संग, शब्द अर्थ का ज्ञात हुआ /इस प्रकार भारत से लेकर ईरान ग्रीक और अरब देश/ फैली थी महत्ता भार्गव की, टर्की इराक यूनान देश।

कवि ने स्पष्ट किया है कि भगवान परशुराम ने आतताइयों को मारा न कि क्षत्रियों को वह लिखते हैं -

 ब्राह्मणों वर्ण में अवतरे भार्गव,पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन किया/ इस तथ्य में कहां तक सच्चाई, किसने विचार कब गहन किया/ जो प्रजा क्षय नहीं होने दे, वह वीर क्षत्रिय कहलाता है/ रघुवंश महाकाव्यम् हमको,ये परिभाषा समझाता है/ ऐसे दुष्टों को संहारा, जो विदेशी क्षत्रिय शासक थे /उद्धारा भार्गव आर्यों को, मारा जो धर्म पिशाचों थे/ यदि परशुराम शत्रु होते, क्यों क्षत्रिय उनका वंदन करते? क्यों सूर्य चंद्रवंशी राजा, बलराम राम नाम रखते? 

लगभग आठ वर्ष पूर्व प्रकाशित ५०० पृष्ठों वाली "परशुरामायण" की काव्यात्मक कथा के माध्यम से सुकोमल जी ने स्वयं के साथ साथ विश्व भर के सनातन धर्मियों में धामपुर का नाम भी पहुंचा दिया है। भगवान परशुराम जी की जय।

संपर्क 9719064630

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