कवि रंजन साव की रचनाएं

 


तुम्हें ढूंढकर भी हम पा ना पाए

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तुम्हें भूलाने के लिए

हमने कितने काम किए ।


लेकिन भूलाने की जगह

सिर्फ अपना समय बर्बाद किए ।


अब भी याद बड़ी आती हो तुम

आकर मेरी नींदों में मुझे सताती हो तुम ।


वो तेरा मुझसे हंसकर बातें करना

तेरी कदमों का मेरे कदमों के साथ चलना ।


सब याद आता है

मेरे दिल को हर पल बड़ा तड़पाता है ।


क्यों भूलकर भी भूला ना पाए

तेरी यादों को दिल से मिटा ना पाए ।


इश्क हमें भी था तुमसे

क्यों चाह कर भी बता ना पाए ।


अब भी मन तुम्हें ढूंढता है

लेकिन तुम्हें ढूंढकर भी हम पा ना पाए ।


मैं भूल जाता हूं

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मैं भूल जाता हूं

क्या होगा याद रखकर ।


सिर्फ तकलीफ ही तो देती है

हर पुरानी यादें ।


हां, उससे जुड़ी हैं अब भी

कुछ अच्छी यादें ।


तो क्या करूं

मैं अब उन यादों का।


क्या होगा 

अब उन यादों को याद करके ।


किसे बताना है

मैं बताऊंगा भी तो कौन सुनेगा ।


या सुन भी लेगा तो वह क्या कर सकता है,

वह भी तो मेरी तरह भूल ही जाएगा ।


आखिर वह भी तो इंसान ही है

लेकिन उसके भीतर भी क्या आत्मीयता बची होगी ।


या मर गया होगा

मेरी अंतरात्मा की तरह ।


~ रंजन साव

हावड़ा, पश्चिम बंगाल

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