ग़ज़ल

  


डा. शाहिदा

कमी कोई न की हम पर सितम ढ़ाने में,

सितमगर अव्वल ही रहा सितम ढ़ाने में |


वो रात को दिन, दिन को रात कहता रहा,

वक्त काफ़ी गुज़र गया उसे समझाने में |


लाख बुलाने पर भी महफ़िल में नहीं आया,

उसके तो दिन रात गुज़रते रहे मयखाने में |


तूफ़ान ऐसा कि चमन वीरान सा लगने लगा,

वक्त कुछ तो लगेगा फिर से बहार आने में |


चमन मे कलियाँ सभी डरकर सहम गयीं हैं,

सिला उसको मिला क्या क्या उन्हें डराने में |


यादे माज़ी रखने का गुनाह हमसे हुआ ज़रूर,

मगर मुद्दत लग जाती है दाग़े दिल मिटाने में |


आग लगाने के लिये बस चिंगारी ही काफ़ी है,

मुश्किलें तो झेलना पड़ता है आग बुझाने में |


मोहब्बत की तपिश तो मेरे दिल मे थी शायद,

मैं बेवजह ढूढ़ता फिर रहा था उसे ज़माने में |


शाहिद, होश खो देता या मदहोश हो जाता,

बात कुछ ऐसी भी न थी साक़ी तेरे पैमाने में |



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