संस्मरण

 डा. ज्ञानवती दीक्षित

एक दिन कुछ ऐसी घटनाएं हुईं कि मैं बहुत परेशान थी। मैनेजमेंट और उनके पिछलग्गू मेरे पीछे हाथ धोकर पड़े थे।इन लोगों ने शिक्षाधिकारियों को भी हर प्रकार का हथकंडा प्रयोग करके अपनी तरफ कर लिया था।मेरे साथ बस सत्य और धर्म में आस्था शेष थे। मैं अर्धरात्रि में सोई । मैंने देखा कई खंडों का भवन है। मैं सबके ऊपर एक कक्ष में बंदिनी हूं। बड़ा मोटा ताला पड़ा है।मेरे कक्ष के बाहर वही मैनेजमेंटी जीव टहल रहे हैं और बहुत प्रसन्न हैं। मैं बहुत व्यथित और अपने को निर्बल अनुभव करने लगी।अचानक मैंने भगवान परशुराम को देखा।वे हवा में खड़े थे ।प्रकाशमान  मुखमंडल,हाथ में चमचमाता फरसा।उनकी दिव्य दृष्टि मुझ पर पड़ी। मैंने हाथ जोड़कर शीश झुका दिया बस। मैंने देखा मेरे कक्ष का ताला स्वत:खुल गया। मैं बाहर निकल आई।मेरे आगे आगे भगवान परशुराम ,पीछे मैं सीढ़ियां उतरती हुई।वे हवा में थे,पर खडाऊं की आवाज मुझे सुनाई दे रही थी।जिस तल पर मैं पहुंचती,सारे ताले खुलते जाते।प्रभु आगे आगे। मैं अनुसरण कर रही थी। सबसे नीचे तल पर पहुंच कर मैं बाहर निकल आई।हरियाली थी।मध्य में एक पगडंडी थी। भगवान उस पगडंडी पर चल पड़े। मुझे मुड़ कर देखा।वे मुस्कुराए। मुझे आशीष देने को हाथ  उठाया।जैसे मेरी सारी व्यथा हर ली हो। मैं खड़ी देखती रही,प्रभु जब तक दिखते रहे। चिड़ियों की चहचहाहट ने मुझे जगाया।

कालेज में मैंने अपनी शिक्षिकाओं से यह स्वप्न बताया।धीरे धीरे जैसे चमत्कार हुए। परिस्थितियां बदलने लगीं और सारे ताले खुलते गये। मैनेजमेंट से भी पीछा छूटा। जिन्होंने स्वत: मार्ग छोड़ दिया।वे किनारे हो गये। जिन्होंने नहीं छोड़ा वे भगवान को प्यारे हो गये। मैं यह सब भगवान परशुराम की कृपा मानती हूं और उनका आशीर्वाद मेरे कालेज पर है ‌।आज उनका जन्मोत्सव है। मैंने गुलगुले बना कर प्रसाद पाया।वे आप सब पर अपनी कृपा की वर्षा करें।जय परशुराम!

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