आत्म ग्लानि के छोह

 कहानी 





सफरात के दूगो लइका बाड़न । एगो नाम ह बसिस्ठ आ दोसरका के जवाहिर। सराफत के अइसे नोकरी पटना में रहे बाकि तनखाह में कवनो दम ना। बड़का लइका के एह खेआल से अपनी भिरी राखत रहन कि दूनों के पढ़ावे के सवकाश नइखे त कम से कम एगो त चांसार निकल जाई आ राह रास्ता धर के हमरो से आगे निकल जाई। 


छोटको लइका के गाँव ही पढ़े के कम ना मौका दिहलन। बाकि इहे कहल जाई कि लकड़ी के दींया ना धरन स त ओकर किस्मत कहल जाई। गाँव के दींया त लाद में समा के अँतरी खा जइहें। भइल भी इहे। जवाहिर के पढ़ाई के बढ़ंति रूक गइल । बिआह भइल त मेहरारू के टिसुना रखे खाती रोज दिन अहरा से मछरी मार लेआवस। बिलाई के परेह के महक मिले त मौका से कराही चाट जाए। बिलइये अइसन गाँव घर में आउर प्रवृत्ति के लोग रहे। जे परेह के कराही कम चाटे बाकि जवाहिर आ जवाहिर बो के बेशी चढ़ावे बढ़ावे आ बेशी चाटे। अंततः अइसन चाट घाटल लोग कि जवाहिर अब अपना भाइए पर गुरनाए लगलन कि बाबूजी भइया के अपना भीरी राखताड़न। हमरा के आपन जामल बुझितन त उनुका के गाँवे आ हमरा के अपना भिरी राख के आदमी ना बनइतन। इहे भावना दूनों भाई में फरक के कारन पर गइल । आ जवाहिर अपना बाबूजी से रोसिया के कह देलन कि तूँ उनुका के हाकिम बनावताड़ऽ त बनावऽ , हम उनुका के एहिजा ( गाँवे) चढ़े ना देब। 


सराफत के बुझा गइल कि एकरा के हम सखुआ के हिर समझले रहीं बाकि गाँव के दींया लाग के बरबाद क देलन स। अब ई समझवलो पर रास्ता पर ना आई । हमरो के तरे तरे आँख देखावता 

। ले के रहो घर दुआर, चैन से। छोट नोकरी में अपने के सम्हरे आ सम्हारे के परी। 


सेवा निवृत्ति के बाद सराफत पटना में सिर छिपावे भर जमीन ले लिहलन। आ बड़का बेटा के दूगो रोटी के ब्यवस्था कर देलन ।

 

गाँव के दींया छोटका के अँतरी तक चाला क देलन तब ओकरा बुझाइल कि हम सब कुछ गँवा दिहलीं। जवन आदमी काल्ह हाल पुछे आवत रहे तवन आज खबरो नइखे लेबे आवत । फरके से तिकता कतना करज के कदई में समाइल बानीं, हम। 


एक दिन ऊ अपना मेहरारू से कहलस - ' सुनत बाड़ीस रे, तनी हेने आव '


' कहऽ का कहताड़ऽ '


' हम कतना करज में डूब गइलीं रे '


' हम त मेहरारू रहीं, तोहरा मरद जात के ना बुझात रहे कि गाँवे के लोग करज के हाँच में कुदावता, का हाल होई। बाबुओ जी से दूराहुत कर देलन स। गोड़ के घाव टभकल भा छाती के का फरक परत बा उहनी के। टभकत आ खउलत बा तोहरा नू, तोहरा नू पीर बा आ तूँ न बाथा से सुतत नइखऽ । उहनी के त आपन चैन के रजाई में बाड़न स। ' 


' इहे बतिया सोच सोच के हमार करेजवा फाटत रहता आ मनवा अकुलाइल रहता। '


' आपन से मिलल गिरल ना कहाला, बाबूजी से मिले पटना जइबऽ ?'


' हँ जाइब, जाइब पटना, हम। '

अगिला दिन जवाहिर पटना पहुँच गइलन । सराफत देख के चिहा गइलन । कहिया भुलाइल आज खुन से खून मिले आ गइल आकि फेरू कवनो टोनहच बाकि रह गइल बा जौना के उसुकावे आ गइल बा । बहुत कुछ सोचला के बाद सराफज कहलन - ' का हो का बात कि एह बेर तूँ आ इहाँ? हमार आउरो कवनो बेजांय सुने के रह गइल बा ? '


' हमार गलती के छमा कर द बाबूजी। हम तोहार लहू हईं । लहू के कामे लहू आवेला। '


' हमरा भिरी सिर छिपावे के सिवाय अब का रह गइल बा। आ तोहार भइयो त ओतने भर कमात बाड़न जतना भर में हमनी के पेट भर जाता, दू गज बस्तर मिल जाता। '


' हम अपना में तोहरा के गैर के भावना ले आके चैन से नइखीं बाबूजी। तूँ आपन तरवा के धूरो देबऽ त हम धन हो जाइब। '


' हमरा आत्म ग्लानि के छोह के का होई? '


' बेटा आज शिरोधार्य कर लिही। '


गाँव के सब दींया कमजोर हो गइल बाड़न ।


विद्या शंकर विद्यार्थी 


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