कवि ऋषि तिवारी "ज्योति" की रचनाएं

 


धरती मां की करुण पुकार 

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भाग दौड़ है,

मची होड़ है,

धन दौलत की जय-जयकार ।

कौन सुनेगा,

भरी व्यथा से,

धरती मां की करूण पुकार ।


शहर नाम है,

बुरे काम है,

बुरे काम की है ललकार ।

जो लूट सके,

खुलकर अपनों को,

उनका जग में है सरकार ।


सत्य लुप्त है,

धर्म गुप्त है,

चहुंओर है हाहाकार ।

कहां पड़ी है,

जंग लगी है,

वीर शिवाजी की तलवार ।


धरा हमारी,

देश हमारा,

मचा है फिर क्यूं अत्याचार ।

धर्म के साथी,

मौन खड़े हैं,

साथ न देती क्यूं सरकार ।


यहां सियासी,

लोग बहुत पर,

नहीं सियासत में कुछ धार ।

धन अर्जित,

करने का अच्छा,

राजनीति इनका व्यापार ।


धन हीं धर्म है,

धन हीं कर्म है,

ये धनानंद के हैं अवतार ।

कौन सुनेगा,

भरी व्यथा से,

धरती मां की करुण पुकार ।


 सोचत मन रघुवीर 

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मानव सम प्रभू ढूंढने,

चले सिया को राम ।

जाकी दृष्टि तिहुंलोक है,

किंतु ना आवै काम ।।


नैनन असुअन राम के,

भेद वक्ष बह नीर ।

वन जंगल से जानकी,

पुछत हैं रघुवीर ।।


मन उदास करि हरि चले,

शबरी है जिस राह ।

रामचंद्र के दरश को,

बीते हैं सालों माह ।।


हुआ सवेरा पुष्प खिले,

शबरी मन मुस्काय ।

धन्य धन्य जीवन हुआ,

दरश राम जो पाए ।।


हांथ लिए फल बैर का,

लखन लाल पछतात ।

बिन खाए फल तजि दिए,

छुपा राम से बात ।।


पोछत चरण कमल रज,

भीलनी नैनन नीर ।

प्रेम बड़ा या बैर है ,

सोचत मन रघुवीर ।।

✍️ ऋषि तिवारी "ज्योति"

चकरी, दरौली, सिवान (बिहार)

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