३० अप्रैल से १६ मई "टेस्टलेस" (आलेख)



प्रियंका दुबे 'प्रबोधिनी

३० ता. की सुबह लगभग १० बज रहे होंगे....सर में कुछ भारीपन सा लगा मैंने सोचा शायद ऐसे ही हो रहा होगा...कुछ देर बाद श्रीमान जी ने कहा कि...अच्छा सुनो!! मेरा सर भारी हो रहा है...लगता है कुछ गड़बड़ हो गया...मैं अब आइसोलेट हो जा रहा हूं...और वे उपर एक कमरे में जाकर स्वयं को आइसोलेट कर लिए...फिर क्या था घर में कुछ कंस्ट्रक्शन चल रहा था सो कामगीर लगे थे..मैंने मेरे सर भारी लगने की बात बताई ही नही...मैं बकायदा मास्क के उपर चून्नी बांध के काम देखने लगी और किचन भी संभाल लिया सर भारी होता जा रहा था ।। पर मैंने नज़र अंदाज़ कर दिया... घर में सासु मां जो दवाईयों पर ही चलती हैं... उन्हें टाईम-टाईम से नाश्ता खाना और दवाई की जिम्मेदारी थी....बेटे को एक अलग रूम में शिफ्ट कर दिया मैं भी एक अलग रूम में रहने लगी परंतु मैं पूरा कवर्ड होकर सबको समय-समय से नाश्ता, खाना, काढ़ा और दवाईयां इत्यादि देने लगी ....दो दिन किसी तरह बीता....अब मुझे कामगीर को मना करना पड़ा क्योंकि १ ता. को मुझे बुखार सा महसूस हुआ...और फिर २ ता. से मुझे बाडीपेन होने लगा ...मैंने पैरासिटामाल लिया और घर के काम करने लगी....पर ये सबकुछ आसान नहीं था....हड्डियां टूट रही थी...असहनीय दर्द हो रहा था पर..करती भी तो क्या करती...दो दिन बाद श्रीमान जी डां. को दिखाने गये तो डा ने कुछ दवाइयां दी और रेस्ट करने को बोला उन्होंने मेरे लिए भी लक्षण के आधार पर कुछ दवाइयां ले आये....मैंने बिना कुछ सोचे-समझे दवाई लेनी शुरू कर दी क्योंकि मैं जल्दी से ठीक हो जाना चाहती थी....बिटामिन बी, सी,कैल्सियम,पैरासिटामाल,एंथ्रोमाईसिन इत्यादि दवाओं का पूरा पैकेज शुरू हो गया १,२,३, ता. तक मुझे बेतहाशा हड्डियों में दर्द था मैं... किस तरह क्या-क्या और कैसे-कैसे कर रही थी .. मुझे कुछ भी ठीक से याद नहीं... बस मैं हर टाईम ताजा भोजन बनाती...और हर दूसरे टाईम आधे से अधिक भोजन फेंकना पड़ता...शिवाय मां जी के कोई भी ठीक से खाना नहीं खा पा रहा था....४ से ५ वें दिन से मुझे सुखी खांसी आने लगी....खांसी ऐसी कि लगता था कलेजा मूंह को आ जायेगा....अब मुझसे मास्क लगाना दुर्भर हो रहा था...एक मिनट को भी मास्क नहीं लगा पा रही थी....मन में तरह-तरह के बूरे ख्याल आने लगे  थे....  इन सबके बीच बहुत से अपनों के खो देने की खबरें भी मिलने लगी थी....मन में निराशा के भाव उदित होने लगे थे...मैं हररोज फेसबुक पर एक पोस्ट जरूर कर देती...साथ में ये जानने की जिज्ञासा भी रहती कि फेसबुक परिवार में सब कुशल-मंगल तो है न....बहुत सी बूरी खबर के बीच कभी-कभी आशा भरी पोस्ट भी दिख जाती थी...फिर कुछ हौसला बढ़ता कि...जब ये ठीक हो सकते हैं तो मैं क्यों नहीं??? हमने ५ दिन तक लगातार दवा ले ली थी....श्रीमान जी को लूजमोशन और बाडीपेन शुरू हो चुके थे....वो तो पूरी दवाई भी नहीं ले पाये थे ......९वीं रात को मुझे लगभग ११ बजे महसूस हुआ कि मैं ठीक से सांस नहीं ले पा रही हूं.…..मैं झट से उठकर फिटकिरी का पानी उबालकर गरारे करने लगी....लौंग, हल्दी, अजवाइन, तुलसी, अदरक उबालकर भाप लेने लगी.....सांस रोककर खुद ही टेस्ट करने लगी...मैं १० सेकेंड से अधिक सांस नहीं रोक पा रही थी....मेरा सांस फूलने लगा था....मैं उल्टा लेटकर सांस लेने की कोशिश करने लगी....आक्सीमीटर से आक्सीजन रीड करने लगी...धड़कन १३० आने लगा...पर आक्सीजन लेवल नार्मल था...पर मेरा दम घूंट रहा था...इससे पहले मुझे ३ ता. से ही मूंह का टेस्ट जा चुका था....मूंह में कुछ भी स्वाद नहीं आ रहा था.....३ ता. को बेटे को १०१ बुखार हो गया मैं बेटे को पैरासिटामाल देने लगी...अजवाईन, कपूर, लौंग की चार पोटली बनाकर मैंने चारों के पास रख दिये...हम थोड़ी-थोड़ी देर पर उसे सूंघने लगे....पर अब मेरा धैर्य टूट रहा था ...अब मैं हिम्मत हार रही थी...बेटे और पति की चिंता होने लगी और साथ में सासु मां को इंफेक्टेड हो जाने से बचाने की चुनौती...पर मैंने एहतियात बरतें और मां जी के कमरे में पूरी तरह कवर्ड होकर जाती उन्हें सुबह की खाली पेट की दवाई से लेकर सत्तू, नाश्ता, फिर दवाई, लंच उसके बाद की दवाई, शाम का काढ़ा स्नैक्स और फिर डिनर और दवाई...पूरे टाइम एहतियात के साथ मैंने सब किया...मां जी को इंन्फेक्टेड होने से बचा लिया....लगभग ८वें दिन कुछ टेस्ट कराया तो कोरोना का सिम्टम नज़र आया.....फिर १० वें दिन डां. ने फिर टेस्ट किया तो रिपोर्ट पाज़िटिव आया अब श्रीमान जी के आइसोलेशन के दस दिन पूरे हो चुके थे.... वे बोले मैं १४ दिन तक आइसोलेशन में रहने के बाद ही अब बाहर आऊंगा...ईश्वर की कृपा से श्रीमान जी और बेटा बिल्कुल ठीक हो गये...इन सबके बीच मेरी खांसी बहुत जोर पकड़ती जा रही थी...घर के सारे कार्य ऐसे ही चल रहे थे.....सबकुछ नार्मल हो रहा था मगर मेरे चेस्ट में पेन की शिकायत बढ़ने लगी थी....डां को दिखाया तो उन्होंने कफ सीरप देकर वापस भेज दिया पर उससे रत्तीभर भी फायदा नहीं हुआ...दूसरी रात फिर से सांस लेने में तकलीफ हो रही थी...फिर सुबह हम डां के पास गये... थोड़ी देर में मेरी आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा...ऐसा लगा जैसे मुझे कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है....मैं डर गई मुझे ब्लैक फंगस की आशंका हो गई और मैं चिल्लाने लगी...कि, मुझे कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है...सबकुछ अंधेरा सा लग रहा है....मुझे बैठा नहीं जा रहा है....फिर मुझे हास्पीटल में लेटाया गया...आक्सीजन वगैरह सब नार्मल था...पर बीपी और धड़कन बहुत तेज था...सांसें भी बहुत तेज  थी....फिर डां. ने एस्ट्राईड, मोन्कुलास, इन्हेलर और  विटामिंस बी, सी, कैल्सियम और साथ में एहतियात बरतने को कहकर भेज दिया....सात दिन तक और दवाये चली...सब ठीक तो हो गया मगर खांसी और चेस्ट पेन वैसे का वैसा ही था....स्वाद अभी तक वापस नहीं आया था...१५वें दिन हम फिर से डा. के पास आये....लगा शायद चेस्ट का एक्स-रे कर दें और कुछ पता चल जाये कि आखिर खांसी क्यों नहीं जा रही....पर उन्होंने एक्स-रे नहीं किया बस एस्ट्राईड दवा बंद करके मोन्कुलास दवा और सात दिन के लिए लिख दिया...और बताया कि टेस्ट वापस आने में टाईम लगेगा....चेस्ट पेन खत्म होने में भी टाइम लगेगा....खांसी इतनी जल्दी नहीं जायेगी....बस क्या था आज १६ दिन हो गये पर ना ही टेस्ट वापस आया नाही चेस्ट पेन में आराम आया बस घर के सभी काम वैसे ही चल रहे हैं.... विकनेस इतनी हो चुकी की पूछिए मत...पर इस बात की खुशी भी है कि हमने कोरोना को मात दे दी है...। इन सब में मेरी दो सहेलियों ने मुझे हररोज फोन करके मेरा मनोबल बढ़ाया...और मुझे अपनी आशावादी सोच से बुस्टर डोज दिया...जिससे मुझे जल्दी ठीक हो जाने में बहुत मदद मिली....इससे भी अधिक मददगार साबित हुआ..योग, प्राणायाम....और सुबह की धूप. .....इससे हमे बहुत ऊर्जा मिलती थी ...जिससे हम सब लड़ पाये....आप सभी अपने आत्मबल से इसे हरा सकते हैं....। अनुभव इतना कड़वा है कि ईश्वर से यही प्रार्थना है कि...दुश्मन को भी ये वायरस न पकड़े...एक-एक क्षण ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे हाथों से जिंदगी छूट रही है... बस मन से यही प्रार्थना कर रही थी कि...हे! प्रभु! अब पूरे मानव जाति को क्षमा कर दो।

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गोरखपुर, उत्तर प्रदेश
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