कवि डॉ अनुज कुमार चौहान "अनुज " की रचनाएं

 


भुजंग प्रयात छंद

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भरोसा हमारे , बफा गीत गाना ।

सहारे किनारे ,खुशी जीत लाना ।।

जता दो इरादे ,नयी रीति बाना ।

दया भाव जागें,धरा प्रीत पाना ।।

 सवैया

राहत पावत नैन लजावत ,रूप निशा पहिचानत आये ।

भोर बनावट खोजत जावत,चांद नज़ाकत झाँकत गाये ।।

सूरत कायल मूरत घायल ,बूँद शिकायत पीर बढ़ाये ।

पेड़ हिफाजत भूल गया जग,मेघ किफायत नीर उड़ाये ।।


 मोर मुकट छवि,कण-कण गाये ।

बजत मुरलिया , मन मुस्काये ।।

स्वप्न जिन्दगी ,जीवन माधव ,

लिखत पढ़त जग,प्रीत सुहाये ।।

अनुजयी दोहे 

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घर में खुशियाँ ढूँढ़ लें,चाहत मिले अपार ।

हवा भयावह बह चली,राहत की दरकार ।।

चिड़िया ओढ़े मौन अब,छाया भ्रम आगोश ।

थका हुआ हर अंक है,रहे आज खामोश ।।

 इजहार 

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चिन्ताजनक इजहार, पीढियाँ ओढ़ लेती हैं ।

बफा के वास्ते वबा,तितलियाँ मोल लेती हैं ।।

अनुज की ख्वाहिशे चाहे,

दफन की नोभतें आये ।

दग़ा पर दे दया के दाग, सीढ़ियाँ तोल लेती हैं ।।

किसान

कली-कली खिली मिले , दिखे लगाव डाल का ।

दशा,दिशा सराहती , पड़ाव राग काल का ।।

चला किसान हाथ में , कुदाल ले कमाल का ।

करे निदान साथ ही , जमीन के सवाल का ।।

सवैया 

खेत खड़े बरसात रमे लखि, सोवत जागत हालत गाये ।

माँग किसान अनाज उगावत , लागत मोर नचावत खाये ।।

आँगन में चिड़िया चहके, महके इस बार पिया घर जाये ।

ना अहसास रहे मधुमास ,बसंत कहाँ शुधि चादर लाये।।

सपूत

भला करो दुआ मिले,अनाथ को दुलार दो ।

गरीब राह में घिरे ,दवा दया विचार दो ।।

सपूत हो चले चलो ,हवा बनो बहार दो ।

कराहती धरा कहे ,गली-गली सुधार दो ।।

 शिखरिणी छन्द 

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खुशी की धारा हो,जड़ित श्रम चाहे जब जहाँ ।

कभी मौक़ा पाये ,विदित कल आये कब कहाँ ??

सदा आशा जागे ,क्षणिक नभ गाये जल तहाँ।

गरीबी के लेखे , भ्रमित सुख राहें छल वहाँ ।।

डॉ अनुज कुमार चौहान "अनुज "

अलीगढ़ , उत्तर प्रदेश ।

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