भारत-अमेरिका को लक्ष्य बना कर चीन चाहता क्या है


-वीरेन्द्र बहादुर सिंह


भारत और चीन के बीच तनाव घटने का नाम नहीं ले रहा है। देश के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने अभी जल्दी ही रूस और ईरान की जो यात्र की है, चीन के साथ संभावित टकराव के संदर्भ में अति महत्वपूर्ण है। राजनाथ सिंह ने इस यात्र के दौरान चीन के विदेशमंत्री से स्पष्ट कहा है कि सीमा पर शांति और सुरक्षा बहुत जरूरी है। इसके लिए आपस में विश्वास होना चाहिए। किसी भी तरह का उकसाने वाला कृत्य नहीं होना चाहिए। इंटरनेशनल नियमों के प्रति सम्मान होना चाहिए। तभी कोई शांतिपूर्ण हल निकल सकता है।


 जबकि चीन की हरकतों से साफ लगता है कि चीन अभी भी भारत के साथ जबरदस्ती संघर्ष पर उतारू है। पिछले काफी दिनों से चीन की यह नीति रही है कि चीन अपने दो प्रतिद्वंद्वियों अंतराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका और क्षेत्रीय स्तर पर भारत को अपनी ताकत दिखाने का प्रयत्न कर रहा है। इंडिया पेसेफिक क्षेत्र में अमेरिका के बर्चस्व को चुनौती देने के लिए चीन ने तमाम मिसाइलों के परीक्षण किए हैं। जबकि भारत को चुनौती देने के लिए चीन ने लद्दाख बार्डर पर सैनिकों को तैनात कर के एलएसी पर तनाव पैदा किया है। कितनी जगहों पर सीमा पार करने की कोशिश भी की है। भारत और चीन के बीच इस तनाव के बारे में नेताओं और सेना के बीच बातचीत चल रही है, पर उसका कोई हल नहीं निकल रहा है। अगर यह तनाव सीमा पर इसी तरह बना रहा तो यह चिनगारी भड़क कर सैन्य कार्यवाई में बदल सकती है।


सवाल यह है कि चीन जब कोरोना काल में अपने देश में ही आंतरिक मुश्किलों का सामना कर रहा है, तब अमेरिका और भारत के साथ तनाव पैदा करने में उसे क्यों रुचि है? इसका उद्येश्य क्या हो सकता है? चीन की परिस्थिति के बारे में जानने वालों का मानना है कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग बहुत ही महत्वाकांक्षी हैं और वह चीन के सबसे शक्तिशाली नेता माने जाने वाले माओ की जगह लेना चाहते हैं। दूसरी तरफ चीन में उनके खिलाफ एक हलचल चल रही है। एक बात यह भी सामने आई है कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के चेयरमैन के पद को वह फिर से स्थापित करना चाहते हैं। अगर ऐसा संभव होता है तो चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के चेयरमैन के पद पर वह अपना चौथा कार्यकाल प्राप्त कर के चीन की जनता के सामने आधुनिक माओ के रूप में खुद को प्रस्थापित करने का प्रयास करेंगे। ऐसा करने से वह अपने खिलाफ तथा अपनी सत्ता के खिलाफ खड़े होने वालों को कुचल देने की तमाम ताकत पा जाऐंगे। जबकि ऐसा करने के लिए शी जिनपिंग खुद कितना मतबूत हैं, यह जनता को दिखाना पड़ेगा। जानकारों का कहना है कि इसी वजह से जिनपिंग दुनिया में सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका और अपने पड़ोसी शाक्तिशाली देश भारत के साथ संघर्ष पर उतर आए हैं। 


कोरोना महामारी का चीन की आर्थिक व्यवस्था पर भी असर पड़ा है। इस स्थिति में चीन के लोगों का कल्याण करने की कोशिश करने के बजाय प्रेसीडेंट शी जिनपिंग ने भारत के खिलाफ अपनी विस्तारवादी नीति पर अमल करने के लिए लद्दाख पर नजरें गड़ा दी हैं। इसका कारण यह है कि कोरोना के कारण चीन की जब दुनिया भर में बेइज्जती हो रही थी, तब चीन ने उम्मीद की थी कि भारत उसके पक्ष में खड़ा होगा, परंतु इस समग्र विवाद में भारत ने किसी का पक्ष नहीं लिया। इस दौरान भारत ने जम्मू-कश्मीर पर अपनी नजर गड़ा रखी थी और कश्मीर में धारा 370 खत्म कर दी। भारत की यह नीति पाकिस्तान के साथ-साथ चीन को भी रास नहीं आई। परिणामस्वरूप चीन ने सैनिक अभ्यास के बहाने पूर्वी लद्दाख क्षेत्र में सैनिक तैनात करने शुरू कर दिए। इसी के साथ गलवान घाटी में भरतीय क्षेत्र पर कब्जा करने की भी कोशिश की।


इसी तरह चीन ओश्र अमेरिका का कोरोना के मुद्दे पर जोरदार वाकयुद्ध चला। अमेरिका ने जब दुनिया में कोरोना फैलाने के लिए चीन को जिम्मेदार ठहराया तो चीन ने इसका जबरदस्त विरोध किया। और जब दुनिया का ध्यान कोरोना महामारी की ओर था तब चीन ने इसका फायदा उठाते हुए दक्षिणी चीन महासागर में अपना बर्चस्व जमाने के लिए सैन्य कार्यवाई चालू रखी। ताइवान के नजदीक चीनी सैन्य अभ्यास शुरू कर दिया। अपने नौसेना के विमानवाहक जहाज और पांच अन्य जहाजों को इस क्षेत्र में तैनात कर दिया। चीन की इस हरकत से अमेरिका भी सावधान हुआ और उसने अपने दो विमानवाहक जहाजों को दक्षिणी चीन सागर में भेज दिए।


चीन की इन हरकतों का जवाब अमेरिका और भारत ने उसी की भाषा में ही दिया। गलवान घाटी में भारतीय सैनिकों का जबरदस्त मुकाबला चीनी सैनिकों के साथ हुआ। तब अमेरिका ने भी इंडियन पेसेफिक ओसन में 31 अगसत को अपना बड़ा सेनिक अभ्यास पूरा किया। अमेरिका की ओर से कहा गया कि चीन की गतिविधियों का हमारी स्थिति पर असर पड़ने वाला नहीं है। क्योंकि दक्षिणी चीनी सागर सहित समग्र इंडिया पेसेफिक ओसन में अमेरिका के 38 युद्धक जहाज मौजूद हैं। इस दौरान अमेरिका ने चीनी कंपनियों पर बैन लगा दिया। भारत में भी चीनी कंपनियों सहित चीनी एैप्स पर बैन लगाया जा रहा है।


चीन की हरकतों के कारण दुनिया इस समय दो भागों में बंट गई है। एक तरफ चीन के नेतृत्व में उत्तरी कोरिया, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, तुर्की और संभावित रूप से रूस और अफ्रीका के कुछ छोटे देश एक हो रहे हैं। तो दूसरी तरफ चीन का मुकाबला करने के लिए अमेरिका प्रयत्न कर रहा है कि उसके नेतृत्व में भारत, जापान, आस्ट्रेलिया, यूएई, साउदी अरब, कुवैत, इजरायल, फ्रांस, ब्रिटेन, फिलीपींस, मलेशिया जैसे देश एक हों। इस तरह चीन के सामने मोर्चा बनाया जा रहा है।


अब सवाल यह उठता है कि क्या चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग दुनिया को फिर से तीसरे विश्वयुद्ध की कगार पर लाकर खड़ा करना चाहते हैं? चीन की अपनी विस्तारवादी नीति के कारण क्या दुनिया एक बार फिर अशांति की ओर बढ़ रही है? चीन की इस विस्तारवादी और आक्रामक व्यापारनीति से चीन का भला होगा या नुकसान, यह सवाल भी अब उठने लगा है।


वीरेन्द्र बहादुर सिंह


जेड-436ए, सेक्टर-12, 


नोएडा-201301 (उ0प्र0)


मो-8368681336


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