अधर्मी कौन..?


जया विनय तागड़े


"वाह यारो आज की पार्टी में तो मज़ा ही आ गया। पुरा स्टाफ़ एकसाथ हैं। बस एक वो मूर्ख को छोड़कर..!"


 


(किसी सरकारी विभाग के कर्मचारियों की साँझा पार्टी चल रही थी। सिगरेट, शराब, अश्लील हॅसी मज़ाक में समय का पता ही नही चला। रात के 11 बज रहे थे। कलेक्टर महोदय के आदेशानुसार शहर में रेस्टोरेंट बंद होने का समय हो रहा था। लिहाज़ा रेस्टोरेंट वेटर ने पर्टीकर्ताओ के लीडर को बिल थमाया।" और तब.......


 


"अरे इतना बिल ..! ये सब क्या है.? जानता है हम कौन है....? अबे जा तेरे मैनेज़र को बुला ला...!"


 


वेटर मैनेज़र को बुला लाता है। मैनेज़र को भी धमकाया जाता है, कि यदि बिल कम न किया तो रेस्टोरेन्ट में रेड पड़वा देंगे। जिसका जिम्मेदार वो खुद ही होगा। विवाद होता देख मैनेज़र बिल को उनके हिसाब से कम करवा देता है। अपनी विजयी मुस्कान लिए सभी शासकीय कर्मचारी अपने अपने गन्तव्य की ओर चल पढ़ते है।


 


अगले दिन लंच टाइम पर जो कि समय से काफी देर पूर्व ही शरू हो जाता है सब मिलकर उस मूर्ख कर्मचारी की विवेचना करते है; जो पार्टी में नही आया था। और उससे सम्बंधित अपने अपने तर्क व अनुभव प्रस्तुत करने लगते है।


 


"यार ये आदमी मेरी समझ के बाहर है । समय पर आता है; आते ही काम करने ऐसे बैठ जाता है ज़ैसेकि सारा ऑफिस इसी के बल पर चलायमान है। रिश्वत नही लेता। बिना वजह छुट्टी भी नही लेता।"


 


"अरे ये सब छोड़ ...! तुम लोगो को पता है इसकी पत्नि की किडनी में खराबी है तो ये खुद अपनी पत्नि को अपनी किडनी दे रहा है। भला ऐसा भी कही होता है। अपनी जान जोखिम में डालकर बीवी को भला कौन मूर्ख किडनी देता है।"


 


"साहब छोटा मुहँ बड़ी बात...! मैं तो चपरासी हुँ। लेकिन एक बात बताऊँ आप लोगो को। अभी दो दिन पहले की बात हैं, काम करते करते उनकी जेब मे ऑफिस का बॉलपेन रह गया होगा।आपको यकीन नही होगा ये जनाब 12 किलोमीटर दूर अपने घर से वापस लौटे सिर्फ एक चार रुपये का पेन वापस लौटाने। ऑफिस की किसी भी चीज़ का इस्तेमाल व्यक्तिगत उपयोग के लिए बिल्कुल नही करते। बहुत बड़े वाले ईमानदार व्यक्ति है।"


 


"वाह रे दीनानाथ ...! तु तो उसका चमचा ही बन गया रे...! तेरे कहने का क्या मतलब है..? हम सब बेईमान है।थोड़ी बहुत ऑफिस कि चीज़ों का इस्तेमाल अपने निजी कार्य के लिए करते है। तो क्या...? अरे देखो इसका मुँह कैसा उतर गया।" 


 


"और नही तो क्या तेरा बस चले तो यहाँ की स्टेशनरी ही नही; बल्कि यहाँ का फ़र्नीचर भी उठाकर ले जाए। हा ....हा...हा...!"


    (सब हँसने लगते है।)


 


"अरे ये सब तो ठीक है इसका परिवार भी कुछ कम नही है।इसका शासकीय क्वार्टर मेरे ही क्वार्टर से लगा हुआ है। हम लोग बिजली के बिल में कटौती के लिए मीटर में बिजली चोरी की व्यवस्था कर देते हैं। ताकि इतने सारे बिजली के उपकरणों का उपयोग निःशुल्क कर सके। इसका बिल भी काफी ज्यादा आता है; मेरी पत्नि ने सहायता करने के उदेश्य से इसकी पत्नि को भी मीटर में बिजली चोरी की व्यवस्था करने की सलाह दी। तो भैया क्या बताएं आप लोगो को; उसने तो साफ मना कर दिया । और बोली हमारे धर्म और जाति में चोरी करना मना है।"


 


"लो कर लो बात एक तो तुम मदद करने गए और ऊपर से तुम्हें ही चोर ठहरा दिया।"


 


"इसके घर का माहौल काफी अलग है।घर मे स्त्रियों का बहुत सम्मान होता है।घर का काम स्त्री पुरूष सब मिलकर करते है। इसके माता पिता रोज़ शाम को झुग्गी बस्ती में जाकर गरीब बच्चों को पढ़ाते है। उनकी छोटी मोटी सहायता करते रहते है।" 


 


"अब मेरी सुनो.....! मैने इसको वैसे वाले वीडियो भेजे।( आँख मारते हुए) इसने मुझे डाँट दिया; पता है क्या बोला..? स्त्रियों की इज़्ज़त करना सीखो। दुबारा मुझे इस तरह के अश्लील वीडियो भेजे तो मुझसे बुरा कोई न होगा।" 


 


"धार्मिक आयोजन के लिए धर्मस्थल के निर्माण के लिए चन्दा माँगो तो साफ़ मना कर देता है। ऊपर से लेक्चर और सुना देता है। कहता है कि गरीबो के लिए घर बनाओ। ईश्वर को घर की क्या आवश्यकता है। ये सारा संसार ही उनका है।"


 


"तू चंदे की बात कर रहा है पगले..! वो तो बिखारी को एक रुपया तक नही देता। पता है क्या कहता हैं..? भिक्षा देकर भिक्षावृत्ति को बढ़ावा नही देना चाहिए; बल्कि उन लोगो को रोजगार से जोड़ना चाहिए। उसने तो कई भिखारियों को विभिन्न स्वयंसेवी संस्थाओं के माध्यम से रोजगार दिलाकर उन्हें आत्मनिर्भर भी बनाया है।"


 


"हा यार तुम सही बोले! उसने मुझे धार्मिक रैली में जाने के लिए भी मना कर दिया । कहने लगा सड़क मार्ग को इस तरह बाधित करना उचित नही है। क्या पता कितने ज़रूरतमन्दों को अपनी मंज़िल तक पहुँचने में विलंब हो रहा होगा।"


 


"अरे छोड़ो साले को....! बड़ा आया हैं जाति और धर्म वाला। वैसे कौन सी जाति धर्म का है ये मानव। जिस पर इसे इतना गर्व है।" 


 


" वो तो पता नही..लेकिन एक बात है यारो..! हम जिस सुकून को बुरे व्यसनों में ढूढ़ते है। यहाँ वहाँ दिशाहीन होकर भटकते रहते हैं । वो सुकून का तेज़ उसके चेहरे पर सदा रहता है। हरदम हँसता मुस्कुराता रहता है।"


 


"हम्म....! तुम सही कह रहे हो। ये बात तो मैंने भी महसूस की है।" 


 


"आज तो ऑफिस भी नही आया।"


 


"साहब को आज फार्म भरने जाना था इसलिए ऑफिस से छुट्टी ली है।


 


कौन-सा फार्म दीनानाथ..?" 


 


"वो साहब मरने के बाद बॉडी अस्पताल को चीर फाड़ के लिए दे देते है उसका फार्म।"


 


"अच्छा अच्छा बॉडी को डोनेट करने का; ताकि आँखे व अन्य अंग किसी और मरीज़ को प्रत्यारोपित कर सके व शरीर का परीक्षण कर मेडिकल स्टूडेंट्स को सिखाया जा सके। ये तो पुरा का पूरा धर्मात्मा है भाई। लेकिन है किस धर्म का पता नही।"


(सभी कर्मचारी हँसने लगते है।)


 


"अरे ये साहब तो आ गए। नमस्ते साहब..!"


 


"नमस्ते दीनानाथ कैसे हो?"


 


"अच्छा हुँ साहब..! आपने तो आज छुट्टी ली थी न।"


 


"हाँ दीनानाथ.. !आधे दिन की छुट्टी ली थी।सो आ गया।( मुस्कुराते हुए)"


 


"साहब एक बात पूछें..? आप किस जाति और धर्म के हो?"


 


"क्यो भई दीनानाथ, क्या हुआ?"


 


"अरे नही साहब बस ऐसे ही...!आपको कभी किसी धर्मस्थल जाते नही देखा। इसलिए पुछ लिया।"


 


"ओह ...(हँसते हुए) उसकी मुझे जरूरत ही नही पड़ती। संसार मे जन्म लेने वाला हर प्राणी अपनी जाति और धर्म का प्रतिनिधित्व करता है। उसके बुरे व्यसन,परिवार के प्रति गैर ज़िम्मेदाराना व्यवहार, बदनीयत, बेईमानी.... ये सब बुरी चीजें केवल उसके व्यक्तित्व पर ही प्रभाव नही डालती; बल्कि उसके परिवार के साथ साथ उसके धर्म व जाति के सम्मान को भी धूमिल करती है। मैं वो करता हुँ, जो मेरे धर्म व जाति के अनुसार सही है।और तुमने मेरी जाति और धर्म के लिए पूछा है न । तो सुनो मेरी जाति हैं - ईमानदारी और मेरा धर्म हैं- मानवता।"


 


उसकी ये व्याख्या सुनकर सभी कर्मचारी गहरे चिंतन में डूब जाते है; शायद उन्हें समझ आ गया था कि व्रत आडंबर, धार्मिक सभाए, शोभायात्रा रैलियां ये सब करने से हमारा धर्म गौरवान्वित नही होता बल्कि धर्मानुसार आचरण करने से हमारा धर्म गौरवान्वित होता है। 


 


 


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