साहित्यिक पंडानामा:८२१


भूपेन्द्र दीक्षित
सिंह की हुंकार है 
हुंकार निर्भय
 वीर नर की।
सिंह जब वन में
 गरजता है,
जन्तुओं के शीश 
फट जाते,
प्राण लेकर भीत
 कुंजर भागता है।
योगियों में, पर, अभय 
आनन्द भर जाता,
सिंह जब उनके
 हृदय में नाद करता है।
यही गति है सच्चे साहित्य की।वह अनहद नाद जो आत्मा के स्वरों में बजता है,वह छुअन जो मां के हाथों में होती है,वह सुगंध जो गीली माटी से आती है,वह श्रद्धा जो गुरु के दर्शन से उत्पन्न होती है,वह किलकारी, जो मातृदर्शन से शिशु के  किसलय कान्त अधरों पर गूंजती है,वही अनुभूति सच्चे साहित्य के अनुशीलन से होती है।
सच्चा साहित्य साधक किसी से भयभीत नहीं होता,किसी की चरण वंदना नहीं करता,किसी लोभ में कसीदे नहीं काढता। इसीलिए लिखा है संस्कृत साहित्य में -बाल्मीकि कवि सिंहस्य कविता वनचारिणी--------!
कविता तो ईश्वर का वरदान है,जो हर किसी को नहीं मिलता।


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