साहित्यिक पंडानामा:८०९


भूपेन्द्र दीक्षित
साहित्य आज जन साधारण से कटता जा रहा है। जहां पुराने कवियों की रचनाएं अनपढ़ भी सुना देते थे,आज बिरले ही किसी रचनाकार का नाम आम जनता की जुबान पर सुनाई देता है।क्या कारण है इसका?
क्या कारण है कि आज साहित्य गुटबाजी में फंसकर जन भावनाओं को समझने में नाकाम रहा है?आज जबरदस्ती कवि या लेखक बनने का प्रयास हो रहा है। साहित्यिक जगत की दुर्दशा के सबसे बड़े जिम्मेदार यही अल्पबुद्धि व्यवसायी हैं।ये इसलिए नहीं लिखते कि इन्हें खुशी मिलती है।ये इसलिए लिखते हैं कि पैसा मिले,टी वी प्रोग्राम मिल जाए,रेडियो का सत्यानाश कर डालें।ये किताब छपाते हैं कि जोडतोड और जुगाड से पुरस्कार पा जाएं।ये इसके लिए कुछ भी कर सकते हैं।किसी भी नाले में इसके लिए मुंह घुसेड़ सकते हैं। साहित्य के असली पंडे हैं ये।तरह तरह के रंगीन झंडे लिए घूम रहे हैं ये। 
भावचक्र यह चला रही है,
इच्छा की रथनाभि घूमती।
नवरस भरी  अराएं अविरल,
चक्रवाल को चकित चूमती।
यहां मनोमय विश्व कर रहा,
रागारूण चेतन उपासना ।
माया राज्य!यही परिपाटी,
पाश बिछा कर जीव फांसना।
                    (कामायनी)


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