मुक्तक

 


1-
गीत प्रीत के हिय से निकसल शास्त्र बनल आख्यान बनल।
भावसुमन खिलि के मँहकल तब परती मन उद्यान बनल।
जीव जगत की खातिर कहियो लोर ढरल जवने ठइयाँ,
साँच बुझीं उहवाँ के माँटी, खर, पाथर भगवान बनल।


2-
अपन गैर ना सोचे कहियो सबके माथ चढ़ा लेला।
अच्छरि-अच्छरि, शब्द- शब्द के रोजे पाठ पढ़ा देला।
अधर हँसी, काने रूई भरि, जीभि लगाम लगावल जे,
बड़े- बड़े वक्ता, वीरन के सचहूँ धूरि चटा देला।


संगीत सुभाष


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