कह-मुकरी


1)फर-फर, फर-फर उड़ती जाए,
   रंग-बिरंगे रंग चमकाए,
   सबके मनको भी हर्षाये,
   का सखि बिजली.?
    न सखि तितली..!!
🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹
2) उमड़-घुमड़ कर मन डरवावे,
     घनन-घनन-घन शोर मचावे,
     सखियों का भी मन घबरावे,
     क्या सखि बन्दरा..??
     न सखि बदरा..!!
🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹
3) देखे सारा तन कर अर्पण,
    दिखलाए सच्चा चित्रांकन,
    हो जाये हर्षित फिर तनमन
    का सखि साजन..?
     न सखि दर्पण..!!
 🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹🔹


स्वरचित


अर्चना भूषण त्रिपाठी,"भावुक"मुम्बई.....


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