संस्मरण


अजय कुमार मिश्र


आज अपने छात्र जीवन की स्मृतियों को शब्दबद्ध कर आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ। आप लोग मुझसे परिचित ही हैं, लेकिन कुछ लोग दूर से ही जान रहे होंगे। वैसे तो मैं हमेशा से ही संजीदा रहा हूँ, शरारती कभी नहीं रहा। हाँ, इतना अवश्य है कि कुछ लोगों  की टाँग खिंचाई कर लिया करता था। कुछ का नामकरण करके, कुछ के नाम का अपभ्रंश करके। परस्नातक गणित में जब हम लोग प्रथम वर्ष में पहुँचे तो कुछ लोगों के नाम रखे गए, कोई छमिया, तो कोई देवि, तो कोई न्यूटन।
वैसे आज की स्मृति प्रथम वर्ष की परीक्षा के प्रथम प्रश्न पत्र से जुड़ी है। उसके विश्लेषण से एक बात स्पष्ट होती है कि कोई व्यक्ति अपने प्रवृत्ति के विपरीत भी कार्य कर सकता है, दूसरी बात ये स्पष्ट होती है कि रस्सी की ख़बर कोई लोगों से गुज़रने के बाद साँप बन सकती है।
जुलाई,१९९७ का कोई दिन रहा होगा। प्रथम वर्ष की प्रथम प्रश्न पत्र की परीक्षा के लिए व्याकुल मन,अधिक अंक लाने की लालसा लिए ईश्वर का स्मरण करते हुए परीक्षा कक्ष में प्रविष्ट हुआ। अपने अनुक्रमांक को तलाश कर सीट पर बैठकर पहिले दाहिने और फिर बायें देखा। बाँए देखते ही मेरी तो बाँछें खिल गयीं। मेरी कक्षा की आकर्षण की केंद्र-बिन्दु वहाँ विराजमान थीं। मैंने उन्हें हाय कहा और बोला अच्छा है, तुम इस सीट पर हो। इस बात पर वो मुस्कुरायीं और बोलीं-“ हाँ! तुम भी यहाँ हो , ये ठीक है।”
फिर प्रश्न-पत्र वितरित हुआ और ईश्वर का नाम( श्री रामजी)( संयोग से इस प्रश्न-पत्र को पढ़ाने वाले और तैयार करने वाले शिक्षक का नाम भी यही था) स्मरण कर प्रश्न-पत्र हल करना प्रारम्भ किए। लेकिन कुछ ही देर में यह महसूस हो गया कि हम बहुत ही ख़तरनाक और रहस्यमयी मार्ग में फँस गए हैं। क़लम की गाड़ी बार-बार आगे बढ़ाते, फिर बैक करना पड़ रहा था और इस प्रक्रिया में काँपी पर काफ़ी कीचड़ एकत्र हो गए। कई बार तो मोड़ पर पहुँच के सूझता ही न था कि आगे कैसे बढ़ें।
लगभग सवा घंटा बीत गये थे, परन्तु एक प्रश्न भी पूरी तरह हल नहीं कर पाए। अब दबाव बढ़ने लगा। दबाव में व्यक्ति और लड़खडाने लगता है, वही हालत मेरी हो गयी थी। कहाँ कक्षा में उच्च स्थान प्राप्त करने की लालसा और कहाँ उत्तीर्ण हो पाने पर संशय। ज़िंदगी में पहली बार हुआ कि ऐसा लगने लगा कि मैं फ़ेल हुआ।
जब व्यक्ति दयनीय स्थिति में होता है, तो अन्य की दशा को देखता है। तो मैंने अग़ल-बग़ल और पीछे बैठे लोगों की भाव-भंगिमा देखना शुरू किया। सबसे पहले बग़ल वाली मोहतरमा को देखा। उनकी चेहरे की चमक थोड़ी धूमिल दिख रही थी, हमेशा हँसता दिखने वाला चेहरा चिन्ताग्रस्त नज़र आ रहा था। अन्य लोगों के चेहरे पर भी बारह बजे थे और उनकी लेखनी भी कभी आगे बढ़ती, कभी बैक गीयर लगाती, तो कभी रुक जाती। मुझे ख़ुशी हुई कि केवल मेरी ही हालत पतली नहीं है, सबकी है। एक बात इससे स्पष्ट हुई कि कोई दुखी व्यक्ति दूसरे को सुखी नहीं देख सकता है। वह चाहेगा कि सभी उसी की तरह दुःखी रहें। उस वक़्त लगभग सभी मुझे मेरी ही दशा में दिखे। यानी मैं बहुमत में था। मेरे मस्तिष्क में ये बात कौंधी कि अगर आप बहुमत में हैं, तो आवाज़ उठा सकते हैं और यहीं से मैं अपने मूल प्रकृति के विपरीत कार्य को सम्पादित करने पर विचार करने लगा-प्रश्न पत्र का वॉक आउट करने का। परन्तु यह कार्य अकेले किया जाना संभव नहीं था क्योंकि सबको बहिष्कार करना होता। सबसे पहले मैंने अपने वाम पार्श्व में बैठी मोहतरमा से पूछा-“ वॉक आउट किया जाये?” उन्होंने कहा-“हाँ”। उनकी हामी मेरे लिए बहुत बड़ी सफलता थी क्योंकि कक्षा में उनके फ़ालोअर्स की अच्छी-ख़ासी संख्या थी। फिर मैंने अजय कुमार सिंह( जिसे मैंने भोला उपनाम दिया था) को संकेत से सहमत किया और ऐसे ही तीन-चार अन्य लोगों को। अब हमें इस कार्य-योजना को परिणत देना था। हम चारों उठे और मैंने कहा भाइयों वॉक आउट। ये सुनते ही कुछ लोग उठे और बाहर निकल गए दूसरी कक्षा की ओर। दूसरी कक्षा में मेरे मित्र-मंडली के अधिक लोग थे, जिसमें सच्चिदानंद तिवारी उर्फ़ सच्चा बाबा जैसे अति उत्साही लोग थे। वे तो जैसे तैयार ही बैठे थे, तुरंत उठ के बाहर आ गए। अब चारों तरफ़ शोर-गुल और अफ़रातफ़री का माहौल हो गया था।
मैं लोगों को आवाहन कर संकाय से निकल कर पीछे की ओर जाने की तैयारी कर रहा था, तभी मेरे हाथ को एक अत्यन्त कड़े स्वभाव के शिक्षक( जो बाद में विश्वविद्यालय के कुलनुशासक भी बने) ने पकड़ लिया। मैंने हाथ छुड़ाकर डर के मारे भागा कि कहीं वे मुझे पहचान न लें। तभी उनका उच्च स्वर सुनाई दिया-“ मैंने पहचान लिया है। बाई नेम रिपोर्ट करूँगा।” मैंने सोचा कि डरूँगा तो मरूँगा। अत: मैं लौटा और बोला-“ सर मेरा नाम ये है। आपको जो करना होगा कर लीजिएगा।” ख़ैर बड़ी मशक़्क़त करनी पड़ी थी सभी परीक्षार्थियों को बाहर लाने में। कुछ के लिए कई विशेषणों का प्रयोग करना पड़ा था। वॉक आउट तो हो गया था, लेकिन पुनःपरीक्षा के लिए काफ़ी मशक़्क़त करनी पड़ी थी। सब मुझे गाली देते थे कि तुम्हीं ने वॉक आउट कराया। किसी ने ये ख़बर उड़ा दी थी कि मैंने उन कड़क शिक्षक को थप्पड़ मार दिया है। ये बात एक सहपाठिनी ने कही कि थप्पड़ क्यूँ मारे, तब पता चली। मैंने कहा-“ तुम्हें लगता है क्या कि मैं ऐसा कर सकता हूँ। अरे आज भी मैं गुरुजनों का चरण-स्पर्श करता हूँ।” तब जाकर उन्हें विश्वास हुआ।
किसी तरह पुनःपरीक्षा हुआ था और हम लोग फ़ाइनल ईयर में गये। फ़ाइनल ईयर की कोई कक्षा प्रारम्भ होने वाली थी, हम लोग बैठे थे। तभी वे कड़क शिक्षक आए और मुझे एवं अन्य छात्रों को बुलाया। हम लोग उनके चेम्बर में गए तो उन्होंने मुझे एक पत्र पकड़ाया, जिसे किसी ने उन्हें भेजा था। पढ़ते ही मुझे हँसी आने लगी, परन्तु किसी तरह नियंत्रण किया। पत्र में अपशब्दों का प्रयोग किया गया था, जान से मारने की धमकी दी गयी थी और पढ़ाने का कार्य छोड़कर चिता के लिए चंदन की लकड़ी की व्यवस्था करने का परामर्श दिया गया था।  मैंने बड़ी विनम्रता से बोला कि सर इतनी घटिया हरकत मैं नहीं कर सकता। उन्होंने स्वीकार भी किया कि तुम्हारा काम नहीं। लेकिन इस बात का पता नहीं लग पाया कि उस पत्र को किसने भेजा था। इसके अतिरिक्त एक और बात का पता नहीं लग पाया। कक्षा में किसी ने छात्र-छात्राओं को टाइटल दिया गया था, उस टाइटल में मुझे चोर घोषित किया गया था( मैं चोर हूँ काम है चोरी, दुनिया में हूँ बदनाम/ दिल को चुराता आया हूँ मैं ये ही मेरा काम)। भाई इस घटना को बहुत वर्ष बीत गए हैं। इन्हें कारित करने वालों तक यदि ये पोस्ट पहुँच जाए तो सामने आयें।
   इस घटना से एक सीख तो मिलती ही है कि ज़िंदगी भी कई बार कठिन प्रश्न-पत्र देती है। परन्तु ज़िंदगी के प्रश्न पत्र से वॉक आउट कभी नहीं करना चाहिए क्योंकि यहाँ पुनः परीक्षा का अवसर प्राप्त नहीं होता।


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