दो पन्ने अखबार के

बहुरंगों से लगे सुसज्जित , क्या कहने अखबार के ।
सारी दुनिया चित्रित करते , दो पन्ने अखबार के ।।


सूर्योदय के पूर्व द्वार पर , हमें जगाने आ गए ।
ज्ञान पिटारा लिए साथ में , नित्य पुरातन या नए ।
खट्टी मीठी घटनाओं को , लाए पृष्ठ उतार के ।
सारी दुनिया चित्रित करते , दो पन्ने अखबार के ।।


कहीं प्रेम की धारा बहती , घृणा उजागर हो कहीं ।
भाग्य बाँचता कोई पन्ना , कहीं कलह का हल सहीं ।
घर बैठे सब हमें बताए , दशा दिशा संसार के 
सारी दुनिया चित्रित करते , दो पन्ने अखबार के ।।


इसकी आहट मिले भोर में , आँखें खुलती हैं तभी ।
कभी सत्य लक्षित करवाता , मिथ्या भी बाँचे कभी ।
कभी देश की बात बताए , कभी खबर घर द्वार के ।
सारी दुनिया चित्रित करते , दो पन्ने अखबार के ।।


कभी बाँच झकझोर गया मन , कभी अधर हँस कर खिले ।
अधिकार कर्तव्य बोध हमें , सदा इसे पढ़कर मिले ।
पहुँच घरों में सेवा देते  , साधन श्रेष्ठ प्रचार के ।
सारी दुनिया चित्रित करते , दो पन्ने अखबार के ।।
     इन्द्राणी साहू"साँची"
    भाटापारा (छत्तीसगढ़)     
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