चेहरे


भीड़ में चेहरे कही खोने लगे।
कुछ दिखाते कुछ छिपाने लगे ।
हुई जुर्म की इंतहाँ देखो ,
आधार पे छप के आने लगे ।
पहचान अब आंसान नहीं ,
परतों में जुर्म छुपाने लगे ।
हसरत भी है अमन चैन हो ,
हो कैसे जब दुश्मन घर आने लगे ।
कर लो अपना दिल पाक साफ़ ,
आइने में चेहरा नज़र आने लगे ।

   सवि शर्मा .....


देहरादून 


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