फागुन

 



फागुन बहे ला धनि फगुनाहटा,
पोरे-पोर पीराइल बा।
अलसाइल बा देंह नसे-नस,
अईंठत कहां जुड़ाइल बा।
अंचरा उड़त ना बोझा समहरत,
पुरहर गोर भराइल बा।
सरसों चना केराय गोंटाइल,
पीयरे रहर फुलाइल बा।


ठाढ़ बा बीचवे पाकत सरसों,
लचकत लोच बुझाइल बा।
सुन्नर खेत में सुन्नरी भउजी,
काटत घास देखाइल बा।
लाली लक लक लाल गुलाबी,
सेन्हुर माँग भराइल बा।
लाल महावर साड़ी पियरी,
हरियर पात तोपाइल बा।


कहीं राग बा कहीं फ़ाग बा,
बिरही बोल सुनाइल बा।
चिरई चहकत गावत कोइलर,
पीपरा पात ललाइल बा।
कहीं परास क गाढ़े लाली,
आछी उजर फुलाइल बा।
भंडभाड़ों क पीयर फूलवा,
भँवरा अब बउराइल बा।।


बउर आम क महुआ मह मह,
गेना खूब सोखाइल बा।
पाकड़ गुल्लर शीशों सहजन,
महकत सांझ बोझाइल बा।
कवन रङ्ग ना लउकत भाखीं,
मनवां मोर मोहाइल बा।
सुघ्घर गांव सीवान बगइचा,
गोहूँ बाल देखाइल बा।


खिलल बसंती मनई बंहकत-
लेकिन मूल भुलाइल बा।
ढोल मजीरा झाल मृदङ्गा,
कतहूँ कहां सुनाइल बा।
गांव क फगुआ रात गवनई,
सर्रर्रर बाह हेराइल बा।
मेल-जोल क रीत ना कतहूँ,
मुँहवा भले फुलाइल बा।।


चोंकरत डीजे छाती फारत,
फूहर गीत सुनाइल बा।
कहां जोगीरा कवन चिकारी,
धोती कहां रँगाइल बा।
भउजी देवर मान ना कवनों,
समधी रङ्ग फ़ेंकाइल बा।
समधिन अंईचत तड़कत-भड़कत,
जवन सनीमा आईल बा।।
(शेष....आगे...)
राकेश कुमार पांडेय
हुरमुजपुर,सादात
गाजीपुर,उत्तर प्रदेश


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