मातृभाषा के उपयोगिता (भोजपुरी के संदर्भ में)

मातृभाषा के उपयोगिता
(भोजपुरी के संदर्भ में)
   - जयकान्त सिंह 'जय'
वर्तमान दौर घोर वैज्ञानिक बा। हर चीज तर्क के तराजू पर तउला रहल बा। दिमाग दिल के दरमस देता। भाव पर विचार हाबी बा।बेवहारिक लोभ-लाभ नइखे त भावनात्मक सम्बन्ध के मोल का? आज शारीरिक आ मानसिक-आत्मिक से ज्यादे आर्थिक मतलब सधे त कवनो विषय-विचार भा वस्तु -व्यक्ति उपयोगी ना त अनुपयोगी। कवनो बात कहला पर  सबसे पहिले इहे सवाल उठऽता कि एसे हमरा का फायदा ? कहे के मतलब  कि आज हर आदमी घोर उपयोगितावादी हो गइल बा। एही से मातृभाषा आ ओकरा उपयोगिता पर बात करे का पहिले एह उपयोगितावादी सोच पर बात कर लेवे के चाहीं।
ई उपयोगितावाद एगो सापेक्षवादी विचारधारा ह। जवना के केन्द्र में होला- सुखवादी दर्शन। कवनो व्यक्ति भा समाज खातिर उहे विषय, वस्तु , व्यक्ति, विचार भा काम उपयोगी बा जवना से ओकर लौकिक सुख-स्वार्थ सधत होखे। पच्छमी विचारक जेरेमी बेन्थम के अनुसार, कवनो वस्तु भा विचार के उपयोगी होखे के कसउटी इहे होला कि ओकरा से जेकर सम्बन्ध होखे त ओकरा के ऊ केतना सुख भा आनंद दे सकऽता। ओकरा इच्छा के केतना पूरा कर सकऽता। अइसे पहिले के उपयोगितावादी सोच में आ आज के उपयोगितावादी सोच में बहुते फरक आइल बा। पहिले उपयोगितावादी मानत रहस कि उहे काम शुभ होला जवना से कवनो खास आदमी भर के हित ना होके सउँसे समाज के हित होखे। यदि ई संभव नइखे त ऊ काम जवन अधिक से अधिक आदमी के जीवन आ सुख में सहायक होखे। आज के उपयोगितावादी घोर स्वार्थी हो गइल बाड़न। निजी लोभ-लाभ आ मतलबी माहौल के चलते परिवार आ समाज में बिखराव आ मनमुटाव बढ़त जा रहल बा। केहू का करनी-कथनी में कवनो मेल नजर नइखे आवत। सभे एक-दोसरा के उपदेश दे रहल बा। मातृभसो के लेके सभकर सोच आ बेवहार कुछ अइसने बा। तथाकथित मातृभाषा के हित चिन्तक मंच से ओकरा के अपनावे, जोगावे आ बढ़ावे के लेके बढ़चढ़के बोलेलें। बाकिर मातृभाषा के लेके खुद के स्तर पर ईमानदार ना होलें। एह तमाम बेवहारिक सच्चाइयन के बावजूद मातृभाषा आ ओकरा उपयोगिता पर विचार-मंथन मनसायन होई।
संस्कृत के एगो श्लोक पढ़ले रहीं-
  " मातृभाषा परित्यज्य येऽन्यभाषामुपासते।
तत्र यान्ति हि ते यत्र सूर्यो न भासते।।"
  मतलब , जवन आदमी अपना मातृभाषा के त्याग के अनकर भाषा अपनावेला भा ओकरे उपासना में बाझ के अपना मातृभाषा के भुला जाला , ऊ ओह घोर-अछोर अंधकार में पहुंच जाला, जहां सूरज के अंजोरो ना पहुंचे। एक तरह से ओह आदमी के आपन अस्तित्व आ जातीय पहचान मेट जाला। एही से देश-विदेश के नामी-गिरामी विचारक, चिन्तक, शिक्षाविद् , भाषाविद् आ मनोवैज्ञानिक मातृभाषा आ मातृभाषा आधारित शिक्षा बेवस्था पर जोर देत आइल बाड़न।
    आज मानव जाति विकास के जवना ऊँचाई पर पहुँचल बा ओकर मूल आधार इहे मातृभाषा अउरी भाषा बा। एकरे माध्यम से ऊ अपना जीवन संघर्ष से अरजल सभ्यता-संस्कृति, सुख-सुविधा, ज्ञान-विज्ञान, विचार-दर्शन, शोध-शिक्षा वगैरह के पीढ़ी-दर-पीढ़ी बढ़ावत-जोगावत इहाँ तक पहुँचल बा। यदि हम सब के पूर्वज एह मातृभाषा भा भाषा के ना अरजले रहितें त हमनियों असहाय-निरुपाय जीया-जन्त, चिरई-चुरूंग आ जानवर के जिनिगी जीये खातिर मजबूर रहतीं। एही सब जइसन हमनियों के जिनिगी ओही कूप अंहरिये में धंसल रहित। भाषा के महातम समझावत एही बात के आचार्य दण्डी अपना 'काव्यादर्श' में लिखलें बाड़न-
" इदमन्धतम: कृत्स्नं जायते
भुवनत्रयम्।
यदि शब्दाह्व्यं ज्योतिरासंसारं न दीप्यते।"(काव्यादर्श१/४)
  दुनिया के हर भाषा में मातृभाषा के महत्त्व बतावल गइल बा। आम आदमी एकरा महत्त्व पर बिना विचार कइले एकर बेवहार अपना जीवन चर्या में करेला। चूंकि मातृभाषा आदमी के एतना ना नजदीक के स्वाभाविक भाषिक माध्यम होला कि ऊ सामान्य अवस्था में एकर मोल-महातम समझबे ना करे। ओकरा अपना विकास में अपना मातृभाषा के महत्त्व सुझबे ना करे। तब भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का कहेके पड़ेल - 
" निज भासा उन्नति अहे,सब उन्नति के मूल।
बिन निज भासा ज्ञान के,मिटे ना हिय के शूल।।"
  मातृभाषा मतलब आपन भाषा, निज भाषा आ जीवन के ऊ पहिल बेवहारिक भाषा जवना में तुतलात बच्चा अबोधावस्था से सुबोधावस्था में डेग धरेला। जीवन से जुड़ल ऊ पहिल पारिवारिक भाषा जवना के जरिए आदमी दुनिया के आउर उपयोगी भाषा के अरजत जाला। मतलब जीवन के ऊ पहिल पारिवारिक-बेवहारिक भाषा, जवन बाद में अरजल हर आउर आन भाषा के मातृभाषा होला। एह मातृभाषा के मनुष्य के आकृति, प्रकृति आ प्रवृत्ति पर साफ-साफ प्रभाव नजर आवेला। जवन एकरा महत्त्व आ उपयोगिता के दरसावेला।
आर्यावर्त भारतवर्ष के आदि ग्रंथ " ऋग्वेद " का एगो ऋचा में कहल गइल बा - ' इला सरस्वती मही तिस्त्रो देवीर्मयोभुव:। ' पच्छिम के विद्वान एकर आंग्लभाषा में अनुवाद कइलें- ' One shoud respect his motherland , his culture and his mothertongue, because they are givers of happiness. '
एह अनुवाद में ' सरस्वती ' शब्द खातिर ' मदरटंग ' के प्रथम कइल गइल बा। एही 'मदरटंग' शब्द के हिन्दी शाब्दिक अर्थ ' मातृभाषा ' बतावत शिशु का माई के भाषा के शिशु के मातृभाषा घोषित कइल गइल। बाकिर मातृभाषा सम्बन्धी एह परिभाषा से कई गो सवाल खड़ा कइल गइल ; जइसे - यदि बच्चा के जनम देते मतारी के मृत्यु हो जाए त ओह बच्चा के मातृभाषा का होई ? बच्चा के मतारी के मातृभाषा बिआह के पहिले ससुरार के पारिवारिक भाषा से भिन्न होखे तब ओह बच्चा के मातृभाषा का होई? आदि। एह से भाषाविद लोग बतावल कि बच्चा के मतारी-बाप सहित ओकरा परिवार आ पड़ोस के परम्परागत बेवहारिक बोली भा भाषा ही ओह बच्चा के पहिल भाषा, निज भाषा, स्वभाषा भा मातृभाषा होखेला। जवना में तुतलात बच्चा अबोधावस्था से सुबोधावस्था में पहुँचेला आ बड़ होके अपना ओही सीखल-अरजल पहिल पारिवारिक भाषा के माध्यम से जीवन-जगत से जुड़ल जानकारी अउर आन भाषा के बोले, पढ़े आ लिखे के क्षमता हासिल करेला। एह तरह से ओकरा उहे पारिवारिक भाषा ओकर आउर अरजल भाषा के मातृभाषा होला।
  अब त जैविक अनुसंधान के आधार पर वैज्ञानिक लोग सिद्ध कर देले बा कि गर्भ में पलात शिशु गर्भ के पाँचवे-छट्ठा महीना से अपना मतारी के ओह पारिवारिक भाषा के समुझे लागेला, जवना परिवार-परिवेश में ऊ जीवन जीयेले। एह तरह से मातृभाषा के 'मातृ' शब्द में बच्चा के मतारी, परिवार, पड़ोस, परिवेश में मातृभाव छुपल बा। जवना में पाला-पोसा के आ संस्कार-परिष्कार पाके कवनो व्यक्ति अपना बचपने से समाज आ संसार के सम्पर्क में आवेला। ओकर सउँसे जीवन ओकरा प्रभाव में रहके विकासमान होला। जवना से कटला के बाद ओह व्यक्ति के स्वाभाविक पहचान आ प्रगति समाप्त हो जाला। एही चीज के पच्छिम के विद्वान अँगरेजी में कहले बाड़न -
  " The term  'Mothertongue' shoud be interpreted to mean that is the language of one's mother. In some paternal societies, the wife moves in with the husband and thus may have a different first language, or dielect, than the local language of the husband, yet their children usully only speak their local language. Only a few will learn to speak mothers' language like natives. Mother in this context probably orginated from the difinition of mother as source, or origin ; as in mother country or land. --------------
  In the wording of the question on mothertongue, the expression ' at home ' was added to specify the context in with the individual learned the language."
   ई मातृभाषा बचपन से लेके बुढ़ारी ले व्यक्ति के प्रकृति, प्रवृत्ति आ प्रगति के प्रभावित करत रहेला। जैव वैज्ञानिक लोग अनुसंधान के आधार पर ई पवले बा कि जर्मन के नवजात अपना मातृभाषा के अनुरूप अवरोही मेलोडी पैटर्न पर रोएला तो फ्रांस के नवजात अपना मातृभाषा के अनुरूप आरोही मेलोडी पैटर्न पर रोएला। जवना से एह मत के पुष्टि होला कि बच्चा मतारी के पेटे में मातृभाषा के ध्वनि-विन्यास समुझे-जाने लागेला आ ओकरा स्वाभाविक विकास खातिर आजीवन ओकर उपयोगिता बनल रहेला। परड्यू विश्वविद्यालय के जैव वैज्ञानिक लोग के अनुसार मातृभाषा बच्चा के मन-मस्तिष्क के विकास पर प्रभाव डालेला। मस्तिष्क के विकास व्यक्ति के आनुवंशिकी, खान-पान, शिक्षा-प्रशिक्षण आदि पर निर्भर करेला। भाषा वैज्ञानिक जैक्स गैंडर के अनुसार मस्तिष्काधार के रचना मातृभाषा के ध्वनियन के संगति में होला। चूंकि चीनी आ भारतीय भाषा अलग-अलग तरह के बा एही से चीनी आ भारतीय मस्तिष्काधार के बनावटो अलग-अलग होला।
 भारतीय वैज्ञानिक सी. बी. श्रीनाथ शास्त्री के अनुसार अँगरेजी माध्यम से इंजीनियर बने वाला शहरी लड़िकन के तुलना में गाँव का मातृभाषा के माध्यम से पढ़ल ओह परिवेश के लड़िका सब अनुसंधान के काम सहजता से कर लेवेलें। एह से एह तथ्य के पुष्टि होता कि खाली किताबी ज्ञान से बुद्धि-विवेक आ तार्किक शक्ति विकसित ना होखे, मातृभाषा सहित सउँसे पर्यावरण के प्रभाव में सबके विकास होला। मातृभाषा का एही उपयोगिता के ध्यान में रखके स्वामी विवेकानंद, अरविंद, टैगोर, गांधी, राधाकृष्णन, यशपाल आदि शिक्षाविद् मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा के वकालत कइलें। भारतीय वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बसु, होमी जहांगीर भाभा, सत्येन्द्र नाथ बोस, मेघनाथ साहा, रामानुजम्, प्रफुल्ल चंद्र राय, अब्दुल कलाम आदि आपन प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा के माध्यम से ग्रहण कइले रहलें। महान भारत वैज्ञानिक आ पूर्व राष्ट्रपति डॉ अब्दुल कलाम धरमये कालेज, नागपुर में कहले रहलें कि हम अच्छा वैज्ञानिक एह से बन पवलीं, काहेकि हम गणित विज्ञान के पढ़ाई अपना मातृभाषा के माध्यम से कइले रहीं।
    भारत के उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू पटना, बिहार के एगो शैक्षिक समारोह में शामिल विद्यार्थियन के मातृभाषा के उपयोगिता आ महत्त्व समुझावत कहले रहस कि मातृभाषा के तुलना में कवनो आउर विकसित भाषा केहू खातिर महत्त्वपूर्ण ना हो सके। मातृभाषा आ आउर दोसर भाषा का फरक के बेवहारिक रूप से समुझावत ऊ अपना आंख से चश्मा उतारत कहलें कि मातृभाषा आँख ह आ दोसर भाषा चश्मा। आँख बा त केतनो दाम आ पावर के चश्मा काम कर सकेला। आँखे ना रही त कवनो चश्मा काम ना करी। एह से दुनिया के आउर केतनो महत्वपूर्ण भाषा जानला-सिखला के बाद अपना मातृभाषा के ना भुलाये के चाहीं। ओकरा विकास ला सतत प्रयत्नशील रहे के चाहीं। मातृभाषा बाँची आ विकसित होई तबे आपन संस्कार, संस्कृति, परम्परागत लोक ज्ञान आ पहचान बाँची आ विकसित हो पाई। महात्मा गाँधी साफ-साफ फरिआ के कहत रहस कि 'सउँसे भारत के अँगरेजी नइखे सिखावल जा सकत,बाकिर सउँसे भारत के ओकरा मातृभाषा के माध्यम से कम समय में आ कम खर्च में साक्षर आ शिक्षित बनावल जा सकेला।'
सचमुच भारतीय जनता के मातृभाषा के बदले विदेशी भाषा के शिक्षित करे के सरकारी भा गैर सरकारी योजना देश के बहुत बड़ जन समूह के अशिक्षित राखेके लमहर साजिश के हिस्सा लागेला।
 महात्मा गाँधी साफ-साफ कहले बाड़न कि ' मातृभाषा से भिन्न भाषा लइकन के तंत्रिका पर बोझ बढ़ा देवेला। लइकन के रट्टू बने से ओकर दिमाग भोथर हो जाला। ओह में मौलिक सृजन के क्षमता घट जाला। विदेशी भाषा अपना मातृभाषा से रिश्ता तूड़ देला आ ओकर विकास अवरूद्ध कर देला। ६५% गाँव के अँगरेजी नइखे पढ़ावल जा सकत, बाकिर उन्हन के मातृभाषा का माध्यम से शिक्षित बनावल जा सकऽता। पढ़ाई खातिर गैर भाषा के सीखे में फालतू समय, मेहनत आ संसाधन खर्च होला। अपना भाषा के माध्यम से हम सीधे ज्ञान-विज्ञान के विषय में प्रवेश कर सकिले।' 
   मातृभाषा का उपयोगिता के मरम एही से समुझल जा सकेला कि अमेरिका, रूस, चीन, जापान, कोरिया, इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, इजरायल आदि देशन के जनता अपना मातृभाषा के माध्यम से शिक्षित होके ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में हमनी से आगे बा। इजरायल जइसन छोट देश अपना मातृभाषा हिब्रू में अध्ययन-अनुसंधान करके दर्जन से ज्यादा नोवेल पुरस्कार ले सकऽता आ हमनी आपन मातृभाषा छोड़के अँगरेजन के पीछे पागल बनल फिरत बानी। अंगरेजी माध्यम के इस्कूल गरीबन का शोषण के माध्यम त बड़ले बा, एकरा संगे-संगे देश के अधिकांश गरीब जनता के अशिक्षित, बेरोजगार बनावे आ संवैधानिक अधिकार से वंचित राखे के लमहर साजिश बा। ज्ञान-विज्ञान के पैमाना कवनो भाषा कइसे हो सकऽता। जापान के वैज्ञानिक हिरोशिमा विश्वविद्यालय के कुलपति अंगरेजी ना जानस त का उनकर अनुसंधान कम मूल्यवान बा।
   स्वतंत्रता संग्राम के दौरान क्रांतिकारी लोग का घोषणापत्र में मातृभाषा के अपनावे आ शिक्षा के माध्यम बनावे पर जोर रहे। नाना साहेब पेशवा के इच्छा रहे कि आजादी के बाद देश के सब काम अपने मातृभाषा में होखे के चाहीं।
देश के वर्तमान केन्द्र सरकार मातृभाषा का उपयोगिता के महसूस करत अब तक के  हर शिक्षा आयोग का प्रस्तावना पर गम्भीरता से विचार कइलस आ नवकी शिक्षा नीति में मातृभाषा शिक्षा पर जोर देलस। अबकी के नवकी शिक्षा नीति के अनुशंसा बा कि पूर्व पाठशाला से पहिल पाठशाला तक खाली मातृभसे पढ़ावल-सिखावल जाव। एह स्तर में बच्चा आपन मातृभाषा आ ओकरा लिपि के पहचान सिखिहें। कक्षा तीन ले मातृभाषा में पढ़ला के बाद दू आउर भारतीय भाषा के लिखल-पढ़ल शुरू करिहें। आगे यदि अभिभावक लोग चाही त बच्चा चउथा भाषा के रूप में अँगरेजी पढ़-लिख-सीख सकेला। एह से प्राइवेट इस्कूलन के मनमाना फीस उगाही पर अंकुश लागी। सभका ला शिक्षा सहज हो पाई। लइकन पर रटे के दबाव कम होई। बच्चा सीधे विषय से जुड़ी। मातृभाषा के माध्यम से भारत के बच्चन में भारतीयता के विस्तार-पइसार होई।
  वर्तमान समय वैश्वीकरण, भूमंडलीकरण, उदारीकरण आ पूंजीवादी-उपभोक्तावादी बाजारू अपसंस्कृति के बा। जवन अपना साम्राज्यवादी-वर्चस्ववादी स्वार्थ के पूरा करे खातिर बहुभाषिक आ बहुसांस्कृतिक देश-दुनिया पर कब्जा करे खातिर एगो साम्राज्यवादी बाजारू भाषा थोपे के जुगत में लागल बा। अंगरेजी के रोजगार आ बाजार ला उपयुक्त भाषा बताके आउर भाषा सबके खतम करे में लागल बा। एकरा खातिर तरह-तरह के हथकंडा आ प्रोपगंडा अपनावल जा रहल बा। मातृभाषा सब के ओकर संवैधानिक अधिकार देवे में अड़ंगा डालल जा रहल बा।
    पूंजीपतियन के हाथे बिकाइल सरकार, नेता, नौकरशाह, बुद्धिजीवी सब कुलीन आ व्यापार के भाषा में आम जनता के रोब गांठें खातिर देश का बहुभाषिक ढाँचा के कमजोर करे में लागल बाड़न। ई हमरा सोच आ संवेदना के अपना अधीन करे में लागल बाड़न। आज टी वी, रेडियो, मोबाइल, कम्प्यूटर, लेपटॉप, पामटाप, रोबोट, अखबार आदि संचार माध्यमन के जरिए नवका जमात के आगे कंचन-काया आ विज्ञापनी माया के मोहक रूपजाल में भरमा-भटका के आपन उल्लू सीधा कर रहल बाड़न। चूंकि बोली आ मातृभाषा के विविधता अउर ओकरा से जनमल लोक-कला, लोक-संस्कृति, लोक-मूल्यबोध आदि आम जनता के भीतर ओकरा अस्तित्वबोध आ आत्मसंघर्ष के तेज-ताप बनवले रहेला आ व्यक्ति, परिवार अउर समाज के हर परिस्थिति के आपाधापी, कुंठा आ हतासा से बचावे में मददगार होला। व्यक्ति आ समाज के भीतर तमाम प्रतिकुल अवस्था से लड़े जुगुत प्रतिरोधक क्षमता पैदा करत रहेला। एही से ओह प्रतिरोधक क्षमता के समाप्त करे के उद्देश्य से लोक भाषा, लोक संस्कृति, मातृभाषा आदि के तुच्छ बतावे के साजिश होत रहेला।
बहुभाषी आ बहुसांस्कृतिक राष्ट्र में मातृभाषा सब के विकास जन जागरूकता आ सुयोग्य नागरिक के तइयार करे खातिर जरूरी होला काहेकि एह तमाम मातृभसन में से कवनो एगो के सब पर जबरन थोपे के सरकारी शासकीय प्रयास के परिणाम घातक होला। पाकिस्तान के बंटवारा आ बांग्लादेश के निर्माण एही मूल्य आ मुद्दन के आधार पर भइल रहे। सन् १९४८ ई. में जब पाकिस्तान में उर्दू के राष्ट्रभाषा घोषित करके बांग्ला भाषी मुसलमान का मातृभाषा बांग्ला के दबावे के सरकारी प्रयास भइल तब बांग्ला भाषी जनता में उबाल आ गइल। मातृभाषा बांग्ला का अधिकार के लेके आंदोलन चले लागल। २१ फरवरी,१९५२ ई. के ढाका विश्वविद्यालय के बांग्ला भाषी छात्र सरकारी आदेश के खिलाफ आ अपना मातृभाषा का पक्ष में प्रदर्शन करे के शुरू कइल। सरकार आंदोलन दबावे पर आमादा रहे। प्रशासन के ओर से खूब लाठी-गोली चलल। बीस-बाइस गो छात्र आ सामाजिक कार्यकर्ता मारल गइलें। आंदोलन तेज होत गइल। ऊ दुनिया के सबसे बड़ आ प्रभावी  'मातृभाषा अधिकार आंदोलन' रहे। पाकिस्तानी सरकार आ प्रशासन का झुके के पड़ल। इहे :मातृभाषा अधिकार आंदोलन' पाकिस्तान का विभाजन के वजह बनल आ सन् १९७१ ई. में एक मजहब के होखे के बावजूद मातृभाषा बांग्ला के आधार पर बांग्लादेश अस्तित्व में आइल। फेर ओही 'मातृभाषा अधिकार आंदोलन' के शहीद छात्रन के इयाद में 'संयुक्त राष्ट्र संघ' (U. N. O.) के इकाई संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक आ सांस्कृतिक संगठन ( United Nation Education, Scientific and Cultural Organization -' UNESCO') यूनेस्को दुनिया के भाषाई आ सांस्कृतिक विविधता अउर बहुभाषावाद के विषय में जागरूकता फइलावे के उद्देश्य से ओही 'मातृभाषा बांग्ला अधिकार आंदोलन दिवस -२१ फरवरी के' "अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस" के रूप में मनावे खातिर १७ नवम्बर, १९९९ ई. के स्वीकृति प्रदान कइलस। सन् २००८ ई. साल के अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा वर्ष घोषित कइल गइल। एह अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के राष्ट्रीय अवकाश घोषित कइल गइल। संयुक्त राष्ट्र संघ के ई निर्णय दुनिया के तमाम मातृभाषा सब के उपयोगिता आ प्रासांगिकता के प्रमाणित करऽता।
भारत एगो बहुभाषी देश ह। इहां भोजपुरी, मैथिली, मगही, बंगला, उड़िया, असमी, संथाली, छत्तीसगढ़ी, अवधी, ब्रजी, कौरवी, हरियाणवी, पंजाबी, गुजराती, काश्मीरी, मराठी, तेलगु, तमिल आदि लगभग पन्द्रह सव से ऊपर मातृभाषा बोलल जालें। सबके आपन-आपन भाषिक, सांस्कृतिक साहित्यिक स्वरूप आ विशेषता बा। पुरातन काल से भारत के बनावे-बढ़ावे आ जिआवे-जोगावे में एह कुल्ह मातृभाषा के अतुलनीय योगदान बा। एह सब में  क्षेत्रफल आ जनसंख्या के हिसाब से भोजपुरी आ तमिल के नाम पहिले लिहल जा सकेला। आउर सब का तुलना में एह दूनों के अन्तर्राष्ट्रीय विस्तारो बहुत व्यापक बा। बाकिर भाषिक अस्मिताबोध आ साहित्यिक विकास के दिसाईं तमिल भोजपुरी से बहुत आगे आ सम्पन्न भाषा बा। अब चूंकि इहाँ भोजपुरी के संदर्भ बात कहे के बा, एही से एकरे के केन्द्र में राखके बात कइल उचित होई।
    भोजपुरी भारत के बहुते पुरान आ जीवन्त बेवहारिक भाषा ह। जवना पर भारतीय विद्वान लोग से पहिले विदेशी विद्वान लोग के ध्यान गइल। भारत के बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, आ उड़िसा प्रांत के मिलल-जुलल पचास हजार वर्ग मील से ऊपर के भू-भाग का जनता के मातृभाषा भोजपुरी देश के आउर औद्योगिक शहरन के अलावे दुनिया के लगभग दू दर्जन देशन में बसल अपना भाषा-भाषी के द्वारा बोलल, लिखल आ पढल जाला। देश-विदेश में भोजपुरी बोलेवालन के संख्या बीस-बाइस करोड़ से अधिका बतावल जाला। आज विश्व के ' पावर लैंग्वेज इंडेक्स' आ विकीपीडिया के १०० भाषा के सूची में भोजपुरी आपन जगह बना चुकल बा।
   भोजपुरी के बक्सरिया, छपरहिया, मल्लिका, गोरखपुरिया, थारू, मधेसी, कासिका, नगपुरिया आदि कएगो क्षेत्रीय रूप-नाम बा। अनेक कवि, साहित्यकार, भाषाविद आदि एकरा के कारूसी, पूरब के बोली, भाखा, देसज भाषा आदि नाम से सम्बोधित करत आइल बाड़न। छठी-सातवीं सदी कवि इसानचन्द, बेनीभारत, नवीं-दसवीं सदी के सिद्ध कवि सरहप्पा, शबरप्पा, कुकुरिप्पा, भुसुकप्पा आदि, नाथ सम्प्रदायी जोगी गोरख, भरथरी, गोपीचंद आदि, पन्द्रहवीं सदी आ ओकरा बाद के संत कवि रामानंद, रविदास, कबीर, धरनी, दरिया, भीखम, लक्ष्मी सखी आदि से लेके बाद के कवि-साहित्यकार लोग के एगो बहुते पोढ़ परम्परा रहल बा जेकरा उपदेश आ साहित्य साधना भोजपुरी समृद्ध होत आइल बा। जवना का अध्ययन-अनुसंधान से एकरा सम्पन्नता आ महत्त्व के बोध होता। एकरा लोक साहित्य आ संस्कृति, भाषिक स्वरूप आ संरचना, व्याकरण आ शब्द सम्पदा आदि के दिसाईं महत्त्वपूर्ण काम उनइसवीं सदी में विदेशी विद्वान लोग केलाग, बीम्स, हार्नले, ग्रियर्सन आदि शुरू कइलें। फेर भारतीय विद्वान सुनीति कुमार चटर्जी, उदय नारायण तिवारी, विश्वनाथ प्रसाद आदि के ध्यान गइल। एह सब के बावजूद एकरा अपना भाषा-भाषी आम जनता के एकरा स्वरूप, साहित्य आ सांस्कृतिक महत्व के बोध ना के बराबर बा। एकर आम जनता एकरा उपयोगिता से अंजान बा। ओकरा एह बात के भान नइखे कि जइसे अंगरेजन के मातृभाषा अंगरेजी ह, चीनी के मातृभाषा चीनी आ रूसियन के मातृभाषा रूसी भाषा ह ओइसहीं भोजपुरी हमार मातृभाषा ह। जइसे ओह सबका अपना मातृभाषा पर गर्व बा ओइसहीं हमरो अपना मातृभाषा पर होखे के चाहीं। भारत के संदर्भ में जइसे आउर भाषा के संवैधानिक अधिकार प्राप्त बा ओइसहीं हमरो मातृभाषा का मिले के चाहीं। जइसे आउर के मातृभाषा के पढ़ाई-लिखाई होता ओइसहीं हमरो मातृभाषा के होखे के चाहीं। जइसे आउर के मातृभाषा रोजी रोजगार के भाषा बनके अपना क्षेत्र आ जनता के विकास में सहायक बनल बा ओइसहीं हमरो मातृभाषा रोजी रोजगार के भाषा बने। जइसे आउर भाषा भाषी अपना मातृभाषा के विकास खातिर सतत प्रयत्नशील बाड़न ओइसहीं हमरो अपना मातृभाषा खातिर रहे के चाहीं। हमरो मातृभाषा हमरा आ हमरा देश खातिर ओतने उपयोगी बा जतना आउर के मातृभाषा उपयोगी बा। मातृभाषा के उपयोगिता से जुड़ल एक एक बात आ सिद्धांत हमरो मातृभाषा का संगे जुड़ल बा। बाकिर एकरा खातिर भाषिक-साहित्यिक संस्थन का भोजपुरी समाज के अपना साहित्यिक आ सांस्कृतिक सम्पन्नता से अवगत करावे के चाहीं अउर मातृभाषा के मुद्दा पर आपसी सब मतभेद-मनभेद मेटा के प्रांतीय आ केन्द्रीय सरकार पर दबावो बनावे के चाहीं।


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