हम भी पंछी बन जाए

 



नभ में नभचर विचरण करते
लंबी लंबी ऊँची उड़ान भरते 
पंक्तिबद्ध हो कतार में चलते
प्रसन्नचित्त हो  कलरव करते


खुशी खुशी खूब हैं चहचहाते
मनमर्जी और मनमानी करते
जहाँ चाह वहाँ की राह चलते
मन की मन से दिल की करते


जितनी भी  ऊँची उड़ान भरते
कभी नहीं द्विज हैं घमंड करते
पांव  सदा धरती पर हैं टिकते
आपस में हैं वो सुख दुख हरते


प्रेम  धुनों पर बहुत हैं थिरकते
प्रेम रागों पर मधु साज बजाते
वैर -विरोध,क्रोध नहीं भटकते
मानवीय  रंगों  में नहीं हैं रंगते


सुखविंद्र हम भी पंछी बन जाएं
दुनियादारी  को  हम भूल जाएं
उन्मुक्त  नभ  में हम समा जाएं
अवगुणों को खुद से दूर भगाएं


सुखविंद्र सिंह मनसीरत
खेड़ी राओ वाली (कैथल)


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