बर्बादी को हमारी वो हथियार छिपाए बैठे हैं

 


अब पता चला वो कितनी खार खाए बैठे हैं,
बर्बादी को हमारी वो हथियार छिपाए बैठे हैं।
हम कभी नहीं भूले भाईचारा निभाना उनसे,
पर हम पर ही घात वो मक्कार लगाए बैठे हैं।


नागरिकता संसोधन बिल का बहाना बनाया है,
हकीकत में दिलों में अपने दरार बनाए बैठे हैं।
सड़कें जाम करके अपनी ताकत दिखा रहे हैं,
हम जाम पकड़े हाथों में सिगार जलाए बैठे हैं।


सोचते हैं हम, हमें क्या लेना लड़ाई झगड़ों से,
वो हमें सफाया करने के विचार सजाए बैठे हैं।
उनकी एकजुटता और हमारी चुप्पी ले बैठेगी,
मंदिर नहीं हम दिमाग में मजार चढ़ाए बैठे हैं।


बड़ी साफगोई से काम को अंजाम दे रहे हैं वो,
बताते हैं दुनिया को हम तकरार बढ़ाए बैठे हैं।
कहते हैं जहर उगलती है "सुलक्षणा" दिन रात,
खुद को इंसानियत का ठेकेदार बताए बैठे हैं।


©® डॉ सुलक्षणा


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