पुस्तक समीक्षा : बेरंग लिफ़ाफ़े



पुस्तक का नाम- बेरंग लिफ़ाफ़े

समीक्षक : हरिओम श्रीवास्तव

लेखक : श्री मनीष भार्गव,नई दिल्ली

सम्पर्क - 9717001594

विधा (प्रकार) : उपन्यास

प्रकाशक : सन्मति पब्लिशर्स, हापुड़, उ.प्र.

संस्करण :  प्रथम, फरवरी 2021

मूल्य : 130/-

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'बेरंग लिफ़ाफ़े' श्री मनीष भार्गव की प्रथम औपन्यासिक कृति है, परंतु मुझे आश्चर्य है कि कोई प्रथम उपन्यास भी इतना समृद्ध व उत्कृष्ट लिख सकता है। मैंने जो पढ़ना प्रारंभ किया,तो एक बार में ही आद्योपांत पढ़ लिया। उपन्यास की भाषा-शैली इतनी सहज सरल व रोचक है, जो पाठक को बाँधे रखने में पूर्णता सक्षम है। 'बेरंग लिफ़ाफ़े' में लेखक श्री मनीष भार्गव के पात्र ग्रामीण परिवेश व आम आदमी के बीच से आते हैं। उपन्यास का नायक संघर्ष करते हुए जिन्दगी में निरंतर आगे बढ़ता जाता है।


यह उपन्यास लेखक के जीवन की वास्तविक घटनाओं पर आधारित है। लेखक एक मध्यमवर्गीय कृषक परिवार से हैं,तथा उपन्यास का नायक भी ग्रामीण परिवेश से आकर नवोदय विद्यालय में शिक्षा प्राप्त करते हुए उच्चशिक्षा प्राप्त कर शासकीय सेवा में विभिन्न नौकरियाँ करते छोड़ते दिल्ली तक पहुँचता है।


इस दौरान घटित प्रत्येक घटना के हर पहलू का सूक्ष्म विश्लेषण किया गया है। गाँव में किसान किस तरह से अन्याय व अत्याचार का शिकार रहता है,परंतु भ्रष्ट व्यवस्था में उसकी कोई सुनवाई नहीं होती है। एक कृषक की जमीन किस तरह से उसके बंधु-बांधव दबा लेते हैं और उसे गाँव छोड़कर कस्बे में जाना पड़ता है। एक छोटा बच्चा जब इन सब घटनाओं को देखता है,तो उसके मनमस्तिष्क पर ये घटनाएँ क्या प्रभाव डालतीं है,इसके हर पहलू की विवेचना लेखक द्वारा की गयी है। 


साईकिल के डंडे में लगी सीट पर बैठकर एक बालक अपने कृषक पिता के साथ तहसील मुख्यालय जाता है। वहाँ पटवारी से जमीन की नपती कराने हेतु उसका पिता गिड़गिड़ाते हुए 20/- रुपये देता है तो पटवारी बेशर्मी से 50/- रुपये माँगते हुए कहता है कि "इससे क्या होगा भाई? गिरदावल साहब भी आएँगे,और वो राजदूत (मोटर साईकिल) से आते हैं, राजदूत से जो पैट्रोल से चलती है और मुझे भी एम 80 से आना पड़ेगा। अंदर है गाँव, बस भी नहीं चलती 50/- रुपए दो।" यह देखकर वह बच्चा पिता से पूछता है कि "पापा यह कौन था?" तब वह कहते हैं- "यह पटवारी था,जमीन को नापता है,हमारी जमीन कहाँ है,हमारी जमीन कितनी है,सब कुछ इसी को पता है। यह किसी को जमीन दे भी सकता है और छीन भी सकता है। मतलब जैसे पानी के देवता वरुण होते हैं,वैसे ही ये जमीन का देवता है।" यह घटना बच्चे के दिमाग पर इतना असर डालती है कि वह गाँव में आकर सबसे कहता है कि मैं तो पटवारी बनूँगा।


बाद में इसी बच्चे का एडमीशन नवोदय विद्यालय में होता है। विद्यार्थी जीवन के हर पहलू का सूक्ष्म व जीवंत वर्णन किया गया है। नवोदय विद्यालय क्यों अच्छे माने जाते हैं व वहाँ के शिक्षक भी कितने अच्छे व वास्तविक गुरु होते हैं,यह सब भी अप्रत्यक्ष रूप से कहा गया है। विद्यालय के अनुशासन पढ़ाई व फिजिकल एक्टिविटी आदि का विशद व्यौरा है। बच्चों को हाउस बनाकर टोलियों में बाँटा गया था। हफ्ते में प्रत्येक हाउस को एक दिन विद्यालय में सफाई कार्य करना होता था। उपन्यासकार लिखता है कि "मैं कपिल और यशपाल सबसे पहले पहुँचते। यशपाल कहता कि जल्दी से कचरा इकट्ठा कर लो और उसमें आग लगा दो जिससे पूरे कैम्पस में दूर से दिखाई दे कि हमने सफाई की है और दिखाना हमेशा करने से ज्यादा जरूरी होता है।" यह अंश उद्दृत करके मैं यह कहना चाहता हूँ कि किस तरह से शिक्षा के दौरान बच्चे दुनियादारी समझते जाते हैं कि "काम करने से अधिक दिखावा भी जरूरी है।"


दसवीं से बारहवीं कक्षा के दौरान अल्हड़ व कच्ची उम्र होती है, इस किशोरवय में अनायास ही लड़के-लड़कियों का परस्पर आकर्षण बढ़ते लगता है और वह समझ ही नहीं पाते हैं कि यही प्यार का अंकुरण है। नायक कहता है - "कुछ समय से मुझे यह एहसास हुआ कि प्रतीक्षा एक ऐसी लड़की है जिससे बात करने में मुझे अजीब सी फीलिंग होती थी।….क्लास में सिर्फ़ उसको देखता रहता था। धीरे-धीरे उसके प्रति एक अजीब सा अट्रैक्शन हो चला था। उसका चेहरा, उसकी आँखें, उसके बाल, उसके कपड़े, उसका चलने का स्टाईल, उसकी किताब, उनपर चढ़ा कवर...धीरे-धीरे उससे जुड़ी हर चीज अच्छी लगने लगी। कोई चीज सिर्फ़ इसलिए अच्छी लगने लगती थी कि इसे प्रतीक्षा ने छुआ है। कोई रास्ता सिर्फ़ इसलिए अच्छा लगता था कि वहाँ से वह गुजरी है।" अंतोगत्वा नायक केवल इसलिए मैथ छोड़कर कॉमर्स ले लेता है कि प्रतीक्षा ने कॉमर्स लिया है।


पढ़ाई के बाद जब शासकीय सेवा में नायक दिल्ली में पदस्थ होता है, तो मध्यप्रदेश पुलिस किसी पुराने मर्डर केस की बंद फायल खोलकर इंक्वायरी हेतु दिल्ली नायक के कार्यालय में पहुँचती है। इसी प्रसंग में पुलिस के रवैये का जीवंत वर्णन हुआ है। शासकीय कार्यालयों का ढर्रा कितना बिगड़ा है यह भी इसी प्रसंग में उल्लेख है। पुलिस इंसपेक्टर का प्रश्न कि " आपने अपने पिछले सभी जॉब्स का उल्लेख विभाग में नहीं किया, जान सकते हैं क्यों?

"क्योंकि किसी भी कार्यालय में जब अधिकारी से दूसरी जॉब या हायर स्टडी की परमीशन माँगते हैं तो ऐसे व्यवहार करते हैं, जैसे उनकी बेटी का हाथ माँग लिया हो।" किसी आम आदमी को पुलिस किस तरह से टार्चर करती है,कैसे पूछताछ करती है, इसके हर पहलू का सूक्ष्म विश्लेषण है। वरिष्ठ अधिकारी ने भी जब इस मामले में मदद से इंकार दिया तो नायक ने गहरी साँस ली और अपने चैम्बर में आया और सोचा कि जब कोई साथ नहीं देता तब हमें ही खुद का साथ देना होता है। उसे गुरु समान अपने बड़े भाई की बात याद आती है कि "जब भी समस्या हो तो आपकी मदद सिर्फ़ आप ही कर सकते हो, और उस मदद में ईश्वर कैटेलिस्ट का काम करता है।"


लम्बे अंतराल लगभग पाँच साल बाद नायक जब अपनी चाहत प्रतीक्षा से मिलने जाता है, तब वह कहती है कि उसके पापा किसी अधिकारी से ही उसकी शादी करेंगे। तब नायक हकीकत के धरातल पर आता है,और सोचता है कि "उससे मिलकर यह समझ में आया कि मुझे उसमें दिलचस्पी थी ही नहीं, मुझे दिलचस्पी उस समय में थी जो मैंने उसके साथ गुजारा था।...मुझे जरूरत थी अपने आपको जानने की,खुद के पीछे पड़ने की, खुद से प्यार करने की..। अतीत यादों में है और हमेशा रहेगा। अतीत अमर है पर जिंदगी वर्तमान है।


एक के बाद एक नौकरियाँ बदलने के बावजूद भी नायक अपनी जिंदगी से असंतुष्ट रहता है तथा सोचता है कि वर्तमान नौकरी छोड़कर IAS की तैयारी करे। इसी उधेड़बुन में वह अपने स्कूली मित्र से बात कर परामर्श हेतु दिल्ली जाता है, जो कि एम्स में डॉक्टर है व IAS बनना चाहता था। वह नायक को जीवन का फलसफा बताते हुए कहता है- "अधिकांश लोग अपने वर्तमान को लेकर दुःखी रहते हैं, कोई जॉब से, कोई परिवार से, कोई साधन से,कोई साधना से,कोई समस्या से तो कोई समाधान से, तो कोई खुद से। हमेशा यही लगता है कि कुछ बेहतर होता तो अच्छा होता और उस बेहतर के चक्कर में अपने पास जो है उसको भी एंज्वॉय नहीं करता। हर किसी की यही समस्या है। तुम्हें इससे ऊपर उठना होगा। कई आई ए एस व आई पी एस अधिकारियों से मिला हूँ मैं, जो अपने काम से दुःखी हैं। टीचर का अपना रोना है,पुलिस का अपना, डॉक्टर के अपने दुःख हैं तो कलाकार के अपने। जिसको जैसा चाहिए वैसा किसी के पास नहीं होता है। अतः अपने आपको सिस्टम में फिट करो और आगे बढ़ो।...जिंदगी वही है जो हम जी रहे है, वह नहीं जो आने वाली है या हम जी चुके हैं। जो भी हम कर रहे हैं उसी को एन्जॉय करना सीखना होगा और इसके लिए हमें सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने एटीट्यूड को चेंज करना है किसी और चीज को नहीं।" 


उपन्यासकार श्री मनीष भार्गव ने जीवन की बारीकियों को बहुत पैनी नज़र से देखा है। इनका दूसरा उपन्यास #नल_दमयंती# भी प्रकाशन में है। मैं इनके उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूँ। 

समीक्षक-

हरिओम श्रीवास्तव

   भोपाल, म.प्र.

दिनांक-25.07.2021

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