जीवन की धारा-!



शरद कुमार पाठक

इस जीवन की

 बहती धारा में

हम सबने क्या क्या पीछे छोड़ा है

खेल सुहाने और लड़कपन

प्यारे बचपन को छोड़ा है

गुल्ली दण्डा और कबड्डी

नटखटपन को छोड़ा है


इस जीवन की बहती धारा में

हम सबने क्या क्या

पीछे छोड़ा है


रंगारंग इस दुनिया में

अपनी संस्कृति को

छोड़ा है 

सारे रिश्ते भूल गए

अदब हया को छोड़ा है


परदेशों में रहकर के

प्यारे गांवों को छोड़ा है

रंग बदलती ये दुनिया

प्रकृति छांव को छोड़ा है


इस जीवन की 

बहती धारा में

हम सबने क्या क्या

पीछे छोड़ा है


                   (शरद कुमार पाठक)

डिस्टिक-----(हरदोई)

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