कहर कोरोना का

 

रेखा रानी

रुक सी गई जिंदगी, 

थम सा गया है शहर।

दहशत भरी जिंदगी, 

बरसने लगा है  कहर।


कोई मुझे यह  बताएं ,

 कि आज क्या   हो रहा है।

खामोश सी क्यूं आज कुदरत, 

जब मजबूर  हर शख़्स हो रहा है।

लगने लगा देखो मेला  यहांअब,

 मौत का जैसे हर एक पहर। 

 दहशत भरी ...........…...

  बेफिक्र बैठी है कुदरत,

 क्यों ऐसा लगने लगा है।

  जब ज़र्रा ज़र्रा मुझे तो,

  शमशान सा लगने लगा है।

छोटे से वायरस से देखो,

 दुबका घरों में  शहर।

दहशत भरी ...….…….

  हुक़ूमत का ऐलान आया, 

हर आदमी आज डर से 

उस पर ही चलने लगा है।

सन्नाटा चीर कर जो ,

घर से निकलने लगा है।

जो मौत के डर से आगे,

 बन मसीहा चलने लगा।

रेखा  बगावत यूं उससे,

 बागी जो करने लगा है।

 हद हो गई है सितम की, 

 यूं नफ़रत का उगला है ज़हर।


🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

रेखा रानी

विजय नगर गजरौला

जनपद अमरोहा,

उत्तर प्रदेश।

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