आवारा पशु

 

राकेश चन्द्रा

आजकल शहरों में आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या नागरिकों के लिये दुःस्वप्न भी तरह साबित हो रही है। हर मोहल्ले में इन कुत्तों को विचरण करते देखा जा सकता है। आये दिन इन कुत्तों द्वारा लोगों  को काटने की शिकायतें मिलती रहती हैं। कतिपय स्थानों पर तो अबोध शिशुओं पर भी हमला करने एवं उनके शरीर को क्षत-विक्षत करने की घटनाएँ भी सामने आ रही हैं। नागरिकों द्वारा इस समस्या के निस्तारण के लिये नगरपालिका एवं नगर निगम से गुहार लगानी पड़ती है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि स्थानीय निकायों के पास आर्थिक एवं मानव संसाधन की नितान्त कमी है। नगरीय क्षेत्रों का विस्तार तीव्र गति से हो रहा है। ऐसे में सीमित संसाधनों के चलते नगरीय निकाय भी अपेक्षित गति से अपना कार्य नहीं कर पाते हैं। आवारा पशुओं के मामले में नगरीय निकायों का निर्धारित स्टाफ ऐसे पशुओं को पकड़ता  है और फिर उन्हें पूर्व निर्धारित स्थलों पर निर्मित बाड़े में उन्हें रखा जाता है। आवारा कुत्तों के संदर्भ में उन्हें पकड़ने व बाड़े में रखने के उपरान्त उनकी नसबन्दी की जाती है ताकि कुत्तों की वंशवृद्धि को रोका जा सके। बाद में पकड़े गए कुत्तों को दूर दराज के ग्रामीण क्षेत्रों में छोड़ दिया जाता है। यहाँ कठिनाई यह है कि सीमित संसाधनों के चलते प्रतिदिन अत्यधिक न्यून संख्या में ही कुत्तों को पकड़ने का काम हो पाता है। इस बीच नगरीय क्षेत्र में विचरण करने वाले कुत्तों की संख्या में अबाध गति से वृद्धि होती रहती हैं साथ ही साथ नागरिकों की तकलीफें भी बढ़ती जाती हैं। ऐसी दशा में आम नागरिक को भी पहल करनी पड़ेगी। यदि हर मोहल्ले या कालोनी में विचरण करने वाले कुत्तों को वहाँ के नागरिक पालतू कुत्तों की तरह पाल लें अर्थात् एक घर के लिये एक कुत्ते को चिन्हित कर लिया जाए एवं उस घर से ही उस कुत्ते के लिये खाने की सामग्री मिलती रहे तो आवारा फिरने वाले कुत्ते काफी हद तक पालतू बन सकते हैं। इसके लिये यह आवश्यक नहीं है कि उन्हें घर में ही रखा जाए। प्रत्येक घर में कुछ न कुछ भोज्य पदार्थ बच जाता है जो प्रायः कूड़े के रूप में फेंक दिया जाता है। कम से कम इस फेंके जाने वाली सामग्री का सदुपयोग इन कुत्तों के लिये किया जा सकता है। इस सामग्री के अतिरिक्त भी खाद्य सामग्री यथाशक्ति उपलब्ध करायी जा सकती है। सम्भवतः ऐसा करने से कुत्तों में पनपने वाली हिंसक प्रवृत्ति को काफी हद तक नियन्त्रित करने में सफलता मिलेगी। इसके अतिरिक्त नगरीय निकाय के कर्मचारियों का सहयोग लेकर कुत्तों की नसबन्दी भी सुगमता से करायी जा सकती है। इस कार्य में सेवानिवृत्त पशु चिकित्सकों का भी सहयोग लिया जा सकता है जो आसपास आवासित हों तथा वर्तमान में वरिष्ठ नागरिक की तरह जीवन व्यतीत कर रहे हों। यही नहीं, इस कार्य के लिये स्वयंसेवी संगठनों की भी सहायता ली जा सकती है। कुत्तों को पकड़कर एक स्थान से दूसरे स्थान पर छोड़ आना समस्या का कोई स्थायी समाधान नहीं है। उचित होगा कि वे जहाँ हैं वहीं पर उनकी संख्या को नियन्त्रित किया जाए तथा वहाँ के निवासी उनसे मित्रवत व्यवहार का प्रदर्शन करें। हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि कुत्ता एक बहुत वफादार जानवर है और मनुष्यों के लिये मित्र पशु है। इसके अतिरिक्त प्रकृति का नियम सामंजस्य है। पृथ्वी पर रहने वाले सभी जीव-जन्तुओं को परस्पर सामंजस्य बनाकर ही रहना पड़ता है तभी जीवन चलता है। मात्र पशुओं की हत्या करने या उन्हें मानव जीवन से दूर रखने से वांछित संतुलन बिगड़ेगा जिसकी क्षतिपूर्ति असम्भव होगी। अतः हम नागरिकों को ही आगे बढ़कर समस्या का समाधान खोजना होगा। हमारे जीवन में पशुओं का भी महत्वपूर्ण स्थान है, यह बात जितनी जल्दी हम समझ लें उतना ही हमारे लिये लाभदायक होगा- भले ही पशु के रूप में कुत्ता हो या कोई अन्य पशु !

राकेश चन्द्रा

610/60, केशव नगर कालोनी 

सीतापुर रोड, लखनऊ 

उत्तर-प्रदेश-226020

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