मातृभाषा राष्ट्र की अस्मिता और गौरव का प्रतीक है

 

मंजूरी डेका

       मानवीय अस्तित्व भाषा के साथ इस प्रकार संबंधित है कि एक के अभाव में दूसरे का स्वरूप ही स्पष्ट नहीं होता। यह मानव जाति की विशेषता है कि शिशु अवस्था से ही वह भाषिक क्षमता जन्म के साथ ले आता है। अन्य किसी प्राणी में यह विलक्षण क्षमता नहीं होती अतः भाषा को मानव जीवन का वरदान कहा जा सकता है। इसके माध्यम से मानव समाज में अपने विचारों तथा भावों को संप्रेषित करता है। भाषा को मानव का सर्वोच्च उत्कृष्ट प्रभावशाली माध्यम और आविष्कार माना जा सकता है। इसकी तुलना में बड़े-बड़े आविष्कार भी नगण्य है। वस्तुतः विभिन्न आविष्कारों के मूल में भाषा की शक्ति ही है । 

        मातृभाषा का शाब्दिक अर्थ है -- मां की भाषा; जिसे बालक मां के सानिध्य में रहकर सहज रूप से सुनता और सीखता है। मातृभाषा मानव अपने माता-पिता, भाई-बहन तथा अन्य परिवार जनों के बीच रहकर सहज और स्वाभाविक रूप से सीखता है, क्योंकि शिशु मां के सानिध्य में अधिक रहता है इसलिए बचपन से सीखी गई बोली या भाषा को मातृभाषा का नाम दिया जाता है। मातृभाषा को मनुष्य का प्रथम भाषा कहा जा सकता है। मातृभाषा सामाजिक दृष्टि से निर्धारित व्यक्ति की आत्मीय भाषा है जिसके द्वारा उसकी अस्मिता किसी भाषाई समुदाय से उसके सामाजिक परंपरा और संस्कृति की विशेषताओं से संबंध होती है।

    भारत में *नई शिक्षा नीति* ने निचले स्तर की पढ़ाई के माध्यम के लिए मातृभाषा या स्थानीय भाषा के प्रयोग पर ज़ोर दिया गया है जिसका उद्देश्य बच्चों को उनकी मातृभाषा और संस्कृति से जोड़े रखते हुए उन्हें शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ाना है। अपनी मातृभाषा या स्थानीय भाषा में बच्चे को पढ़ने में आसानी होगी और वह जल्दी सीख पाएगा उसकी नींव मजबूत होगी। मातृभाषा की शिक्षा का और एक उद्देश्य यह भी है छात्रों में विभिन्न मानसिक, नैतिक तथा संवेगात्मक शक्तियों के विकास एवं कुशलता उत्पन्न करना। 

  भारतीय नवजागरण के अग्रदूत के रूप में प्रसिद्ध *कवि भारतेंदु हरिश्चंद* जी ने निज भाषा का महत्त्व बताते हुए लिखा भी हैं कि --

 *‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।’* 

   भारत की निज भाषा से भारतेन्दु जी का तात्पर्य हिन्दी सहित भारतीय अन्य भाषाओँ से रहा हैं। उनके अनुसार अंग्रेजी जैसी विदेशी भाषाओँ में प्राप्त शिक्षा से आप प्रवीण तो हो जाओगे किन्तु सांस्कृतिक एवं व्यावहारिक दृष्टिकोण से हीन ही रहोगे। उसी काल में भारतेन्दु जी ने मातृभाषा में शिक्षा की अवधारणा को भी साकार करने का अनुग्रह किया हैं। बिना मातृभाषा के ज्ञान और अध्ययन के सब व्यवहार व्यर्थ हैं। इसी संदर्भ में भारत के पूर्व प्रयात राष्ट्रपति एवं वैज्ञानिक *डॉ. अब्दुल कलाम* के शब्दों का यहां उल्लेख करना उचित होगा कि -- “मैं अच्छा वैज्ञानिक इसलिए बना, क्योंकि मैंने गणित और विज्ञान की शिक्षा मातृभाषा में प्राप्त की।’’।

  भाषा एक व्यवस्था है, इसकी प्रकृति सृजनात्मक है। इसलिए मनुष्य को अलग-अलग भाषा भी सीखना चाहिए *भाषा किसी की पैतृक संपत्ति नहीं होती*। कोई भी भाषा जो सीख ले वह भाषा उसकी बन जाती है। भाषा, उपभाषा, बोली, उपबोली ही किसी भी जाति- समुदाय की साहित्य - संस्कृति को समृद्ध बनाती है, इसके द्वारा व्यक्ति अपनी व्यक्तित्व का विकास कर सकता है, विभिन्न साहित्य का रसास्वादन भी किया जा सकता है। 

      कुछ भाषा आपको सुनने में अट -पट्टा सा लग सकता है लेकिन हर एक भाषा की अपनी गरिमा होती है और हमें हर प्रकार की बोली, हर प्रकार की भाषाओं के प्रति सम्मान प्रदर्शन करना चाहिए। 

     भाषा के महत्त्व की स्वीकृति आधुनिक युग की उपलब्धि नहीं है बल्कि मानव संस्कृति के विकास काल से ही भाषा का महत्व स्वीकृत रहा है वेदों में इसकी भूरी भूरी प्रशंसा हुई है। ऋग्वेद में तो इसकी तुलना देवी शक्ति से की गई है---

'' महो देवो मत्यो आ विवेष ''

    अतः यह कहना चाहूंगी मातृभाषा को मित्रभाषा बनाइए मात्रभाषा बनाकर मृत भाषा ना बनाएं, मातृभाषा की उन्नति के लिए हमे हमेशा प्रयासरत रहना चाहिए यही हमारा कर्तव्य है...... 


मंजूरी डेका, शिक्षिका

विश्वनाथ, असम

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