डॉ अनुज कुमार चौहान "अनुज" की कलम से

 



 उत्कृष्ट गर्व नक्षत्र अटल !!

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राजनीति के भीष्म पितामह ,

उत्कृष्ट गर्व नक्षत्र अटल ।

रचना शील काव्य गुण धारी ,

लोक तन्त्र स्तम्भ पटल ।।




जय विज्ञान घोष ,उदघोषक ,

राष्ट्र समर्पण , मन निश्छल ।

सेवा देश प्रगति आयामी ,

प्रेरक चरित्र ,सह मौन प्रबल ।।


सदा ए शरहद के अनुगामी ,

दूर दृष्टि ,  कावेरी -जल ।

मजदूरों का शोषण हृदय ,

दृश्य दिखाता ताजमहल ।।


परमाणु वैश्विक सुदृढ शक्ति,

स्वर्णिम चतुर्भुज ,वतन सबल ।

पांचजन्य ,वीर अर्जुन सैंग ,

राष्ट्र धर्म ,कर्तव्य सचल । 


संकल्पित धर्म गठबंधन ,

नेतृत्व प्रमुख ,हलचल के हल ।

भारत रत्न शृद्धेय संदेशक ,

भुला ना सके ना ,

जल -नभ -थल ।।



 वृहद सख्सियत प्रणव नमन !!

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वेहद अहम सादगी दर्शन ,

सहिष्णु , वहुलतावाद अमन ।

मुखर -प्रखर व्यक्तित्व सजग,

जय-जय-जय,जय हिन्द -रतन ।।

सरल स्वभाव, स्नेह ममतामय,

शालीन - शील , गरिमा उद्यम ।

मौलिक ज्ञान ,पारखी - दृष्टि ,

प्रासंगिक युग - युग उत्तम ।।



सम्बल- सहमति राजनीति-सम ,

नैतिक मूल्य ,प्रतिबद्ध चमन ।

संस्कृति ज्ञान, विज्ञान- केन्द्र,

जीवन विराट, निश्छल तन-मन ।।

आभास उपस्थिति वैचारिक,

परिपक्व विरासत , आदर्शतम ।

अद्भुत युक्ति-विलक्षण प्रतिभा ,

मूल्य -मान्यता , उत्तम धन ।।

कर्मवतन-हित विस्मृत नहिं हो,

दल छल मुक्त शक्ति स्मरण ।

उदारवाद छवि, शख्त प्रशासक,

वृहद सख्सियत , प्रणव नमन ।।


जिन्दगी बर्वाद होती , बाल-श्रम अभिशाप है 

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मासूमियत मजदूर बनती , पारिवारिक पाप है ।

जिन्दगी बर्वाद होती , बाल-श्रम अभिशाप है ।।

राग अध्ययन छूट जाते , फिर नशे में टूट जाते ।

साथ ही सपने सुहाने , गम लिये ही फूट जाते ।।

लूटती यह  कुप्रथा जग , लाभदायक श्राप है।

जिन्दगी बर्वाद होती , बाल-श्रम अभिशाप है ।।

अन्त ऐसी रीति का हो, मन्त्र पाना चाहिए ।

होनहारों को व्य्वस्थित , तन्त्र लाना चाहिए ।।

हम भी ओढ़े हैं कयामत , राह में रँग छाप है ।

जिन्दगी बर्वाद होती , बाल-श्रम अभिशाप है ।।


खुद सदा झेलें नदी को,अब किनारे तुम नहीँ 

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खुद सदा झेलें नदी को , अब किनारे तुम नहीं ।

है प्रभु ,अपना सहारा , बेसहारे हम नहीं ।।

आर्थिक हानि भी करते , फिर कहाँ? अपने सजे ।

खौप के तुम शक्ति दाता ,

हम कहाँ ? सपने भजे ।।

राजशाही तुम लिये हो , झूँठ प्यारे हम नहीं ।

खुद सदा झेलें नदी को , अब किनारे तुम नहीं ।।

हम जो कहते हैं करेंगे , हर मुकुट जो लाभ हैं ।

आज तक के सब अभागों, को हमेशा त्याग दें । 

रोशनी संघर्ष की ही , जग जनम कारे नहीं ।

खुद सदा झेलें नदी को ,अब किनारे तुम नहीं ।।

गीत लिखकर गीतिका भी, प्रीतिका की शान है ।

दान जो पुरखों ने दीना , रीति की पहिचान है ।।

ऐसी परिभाषाओं से ही , सुधि अनुज हारे नहीं ।

खुद सदा झेलें नदी को , अब किनारे तुम नहीं ।।


 मंदारमाला छन्द 

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आकाश भाये सुहाने तराने न ,

जाने कहानी खयालात सी ।

आभास आगाज आवाज नाराज,

दीखे जुबानी सवालात सी ।।

पौधे लगा दो जगा दो हवा लोक,

आशीष वाणी मुलाक़ात सी ।

वाचाल हालात रोये धरा जान,

तारीफ मानी दया रात सी ।।


डॉ अनुज कुमार चौहान "अनुज"

अलीगढ़ , उत्तर प्रदेश ।

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