शरद कुमार पाठक की कलम से


नव विहान-!

इस नव विहान
 के आंँगन में
धरा किरण मुसकाये
वेगों में बहती धारायें
स्वर कल कल
करती नदियांँ
शोभायमान अब अम्बर
सूर चाप की रेखाएं
फूटीं नव कोपल तरुवर
शाखाएं लहरायें
वन उपवन कलरव करते
सुन खगदल की भाषाएं
राग सुनाती मधु कोकिल
फूल भृमर मड़राये
इस नव विहान
 के आंँगन मे
धरा किरण मुसकाये 

पावस की सांँझ-!

उतर रही है धीरे-धीरे
अब पावस की सांँझ
झीनी झीनी पड़ रही 
अब पावस की बूंद
लौट रहे हैं खगदल
अब अपने अपने नीड़
उड़ रहे हैं विरल पंक्ति में 
लेकर गादुर चले समूह
झिल्लिका आवाज करते
अब दादुरों की टरटराहट
उतर रही धीरे-धीरे
अब पावस की साँझ
लग रही धीरे-धीरे
 घर के चौरस पर
अब जरठो की चौपाल
घर की प्राचीरों के ताखों पर
अब होता उजियार
उतर रही धीरे धीरे
अब पावस की सांँझ

                  (शरद कुमार पाठक)
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