नशा


डॉ अवधेश कुमार अवध

क्या नशा करके मिलता बताओ ज़रा।

लाभ दो-चार हमको  गिनाओ ज़रा।।


वंश परिवार की सारी इज्ज़त गई।

बीवी विधवा की जैसी बेइज्ज़त भई।

पूर्वजों को मिलीं गालियाँ- फब्तियाँ-

माटी में मान अब ना मिलाओ ज़रा।। 


बाप- माई की मुश्किल दवाई हुई।

बाल-बच्चों की मुश्किल पढ़ाई हुई।

दूध में कितना पानी मिलाएँ, कहो-

बाप का फ़र्ज़ थोड़ा निभाओ ज़रा।। 


खेत तालाब गैया व बछिया बिकी।

आज  बीवी पे तेरी  नज़र है टिकी।

अब चटौना का चम्मच हुआ लापता-

क्या से क्या हो गए हम दिखाओ ज़रा।। 


साँस की डोर तेरी सिकुड़ने लगी।

मौत आकर बगल में अकड़ने लगी।

इस  नशे  ने  है लूटा  हमारा चमन-

'है  जहर हर नशा'  ये सुनाओ ज़रा।। 


वक्त-बेवक्त तुम तो चले जाओगे।

हाथ  में  दे  कटोरा भले जाओगे।

लोग रोटी के बदले में तन देखेंगे-

हे अवध अब तो काबू में आओ ज़रा।। 


डॉ अवधेश कुमार अवध

मेघालय - 8787573644

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