करके दूसरों को बदनाम

 

श्रीकांत यादव

बेमतलब की बातें हैं 

कौन आता है किसके काम

अपने ही करते हैं रहमों सितम 

गिराते हैं बिजलियां


मानवता का भी 

कम लगाकर दाम।


पहले भी थी दूरियां

रहती रही होगीं तब

उस समय की अपनी

कुछ सामाजिक मजबूरियां

लोग फासले से मिलते थे

लेकिन हौसले से मिलते थे

यही थे कुछ गिले शिकवे

शिकायत यही थी सरेआम।


कुछ लोग जानते हैं 

शतरंजी फितरत को

किससे मिलना है 

किससे रखनी है दूरियां

कहां सेकनीं हैं पूरियां

किनकी भावनाओं का

सरेआम करना है कत्लेआम

इज्जत को करना है नीलाम।


कुछ बहानों में माहिर हैं

जादू है उनकी फितरत में

वो बखूबी जानते हैं

किससे रखनी है शोहबत

किससे रखनी है मोहब्बत

साधने को अपना मतलब

खुद को करना है सरनाम

करके दूसरों को बदनाम।


उनके बदमाशी के

किस्से कहां बहुत कम हैं

लोग मिलते ही नहीं

पाए जाते हैं वहीं

कुछ तो होंगी दुष्वारियां

मिलती होंगी सहूलियतें

तभी तो रहते हैं वहीं

यदुवंशी उनके पास

बेनागा रोज सुबह-ओ-शाम।


श्रीकांत यादव

(प्रवक्ता हिंदी)

आर सी 326, दीपक विहार

खोड़ा, गाजियाबाद

उ०प्र०!

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