अधूरी ज़िंदगी

 

इंदु मिश्रा 'किरण'

आज का चाँद इतना बुझा-बुझा -सा क्यों दिख रहा है? उसकी रौशनी में नमी-सी है।जाने क्यों हर तरफ़ सन्नाटा ही सन्नाटा पसरा हुआ है। आज का चाँद बादलों के अठखेलियाँ कर रहा है? कितने सपने बुनती रहती थी चाँद को देखकर। यही चाँद मुझे बहुत हसीन लगता था।मेरे दिल के बहुत क़रीब था।यही चाँद साक्षी है मेरे देखे हर हसीन सपने का। स्वाति अपनी खिड़की से चाँद को निहारते हुए सोच रही थी।

 एक प्रश्न उसे उद्वेलित कर रहा था कि आख़िर वो मुझसे दूर क्यों रहना चाहता था?क्या मैं उसके लायक नहीं थी?क्या मेरे प्यार में कमी थी ? अगर मैं पसंद नहीं थी तो शादी क्यों की ?शादी देखकर की थी। हमने देर तक बात भी की थी।फिर ऐसा क्यों ?

इसी सोच में डूबी स्वाति दुनिया से बेख़बर थी।

दरवाजे की घंटी सुनते ही उठकर दरवाज़ा खोला।दरवाज़े पर उसकी बहुत पुरानी सहेली अरुणा खड़ी थी।

अरे ,अरुणा तुम ! आओ ,आओ।इतने दिनों बाद कैसे याद किया ?

 अरुणा और स्वाति बैठकर बातें करने लगती हैं।स्कूल की बातें ,कॉलेज की बातें ,घर परिवार की बातें। पुरानी बातें याद करके अरुणा हँसती खिलखिलाती लेकिन स्वाति ज़बरदस्ती मुस्कुराकर रह जाती।जैसे हँसी किसी ने छीन ली हो।

अरुणा बहुत देर तक उसके चेहरे को पढ़ती रही फिर पूछ बैठी।

'अरे, स्वाति तेरी शादी तो अभी दो महीने पहले ही हुई है न ?लेकिन तेरे चेहरे पर ये उदासी कैसी ?सब ठीक है न ?तेरा पति तो तुम्हें बहुत प्यार करता होगा ?उसकी याद में उदास है क्या ?फ़ोन करके बुला ले।चली जा।उदास होने की क्या ज़रूरत है? अरुणा ने चुटकी ली।

'अरे ,कुछ नहीं हुआ।बस ऐसे ही आज मन उदास है।तू मेरी चिंता मत कर।अपनी सुना।तेरे पति कैसे हैं ?ससुराल वाले ठीक हैं न ?' स्वाति अपनी बातों में अरुणा के प्रश्नों को टालना चाह रही थी।ज़बरदस्ती होठों पर मुस्कान ला रही थी।

 'देखो स्वाति, तुम भले ही अपनी बात मत बताओ, छुपा लो मुझसे।मैं तुझे बचपन से जानती हूँ।तुम्हारी रग-रग से वाकिफ़ हूँ।इतना बुझा-बुझा -सा तुम्हारा चेहरा तो कभी नहीं देखा।'

  स्वाति की आँखें छलक आईं।अरुणा के गले लगकर फूट-फूट कर रोने लगती है।ऐसा लगा जैसे भटकते मन को कोई सहारा मिल गया।

  रोते-रोते कहने लगी।अरुणा, मैं बहुत बुरी हूँ न?मुझे कोई प्यार नहीं करता।मेरा पति भी नहीं।दो महीने ही शादी को हुए, शादी टूट गई।सबकुछ बिखर गया अरुणा।सारे सपने टूट गए।कितने हसीन सपने लेकर मैं ससुराल गई लेकिन सब बिखर गए।कुछ नहीं बचा।

'स्वाति,क्या हुआ?कुछ बताओ भी या रोती ही रहोगी।तुम जैसी सकारात्मक विचारों वाली लड़की इतनी निराश?क्या शादी तक ही ज़िंदगी सीमित थी तुम्हारी। पति का प्यार पाना ही सिर्फ़ खुशी है इस दुनिया में?'अरुणा ने उसे प्यार से डाँटते हुए कहा।

जानती हूँ अरुणा ,मन को बहुत समझाती हूँ लेकिन बार-बार यह हीन भावना मन में आ जाती है कि मैं बहुत बुरी हूँ इसीलिए मेरी शादी टूट गई।मैं अपने पति का प्यार नहीं पा सकी।जानती हो ?शादी के बाद कुछ दिनों तक हमारे बीच बात चीत होती रही लेकिन बाद में मेरे पति ने कमरे में आना ,मुझसे बात करना भी बंद कर दिया।अपने माँ के कमरे में दरवाज़ा बंद करके बैठ जाता था।पूछने पर यह ज़वाब मिलता कि वर्क फ्रॉम होम चल रहा है।मैं चुप हो जाती थी।धीरे-धीरे एहसास होने लगा कि वो मुझसे दूर रहना चाहता है।मैंने उसके बाद भी बहुत कोशिश की अपनी ज़िंदगी सँवारने की।बहुत दुःख ,तकलीफ़ भी सहती रही।अपने आत्मसम्मान को दबाकर हर तरह कोशिश करती रही।मगर सब कुछ बेकार रहा।रवि के दिल में जगह नहीं बना पाई।कहते -कहते स्वाति फिर रो पड़ी।

      ' स्वाति ,ऐसे लोगों के लिए क्यों आँसू बहा रही हो?तुम्हारी सास ने कुछ नहीं कहा ?'

 नहीं, अरुणा ,वह भी रवि को ही सही ठहराती थीं।कहतीं थीं कि उसके ऑफिस का बहुत काम आ गया है।उसके कमरे में मत जाना।कॉन्फ्रेंस कॉल पर है।दिन तो ऐसे बीत जाता और रात को बिस्तर पर आते ही मुँह फेरकर सो जाता था।अगर मैं कोशिश करती बात करने की तो कहता कि नींद आ रही है सोने दो।मैं रातभर प्रतीक्षा करती रहती कि कब रवि मुझे गले लगाएगा, कब मुझे प्यार से छुएगा किंतु वह दिन कभी आया ही नहीं।जब मैं छूने की कोशिश करती तो मेरा हाथ झटक देता।मैं रोकर सो जाती।दूसरे दिन की प्रतीक्षा करने लगती।धीरे-धीरे सब्र का बाँध टूटने लगा।मैंने यह बात अपनी माँ को बताई।बात लड़ाई-झगड़े में परिवर्तित होने लगी।लेकिन मैंने निर्णय लिया कि मैं घर छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगी।कभी तो मेरे प्यार का असर होगा।मैंने नौकरी की तलाश की और एक अच्छे स्कूल में नौकरी भी मिल गई।मैं भी स्कूल के काम में व्यस्त रहने लगी और अच्छे वक़्त की प्रतीक्षा करने लगी।इसके बाद तो और भी बुरा हुआ।माँ और बेटा मुझे घर में अकेले छोड़कर कहीं और चले गए।मैं अकेले घर में डरने लगी।नींद न आये।रातभर डर में बीतता और सुबह स्कूल जाती।बहुत बुरी हालत होने लगी।फिर मैंने हिम्मत नहीं हारी।फिर एक दिन मेरे मम्मी-पापा ने ससुराल पक्ष वालों से कहा कि हम सभी आकर बात करते हैं कि आख़िर दिक्कत क्या है ?

    'फिर क्या हुआ, स्वाति?अरुणा ने पूछा।

सब बेकार गया।सभी लोग इकट्ठा हुए लेकिन रवि घर पर बहुत बार फ़ोन करने पर शाम को आया और कोई बात होती उससे पहले ही कहने लगा मैं मर जाऊँगा।बालकनी से कूद जाने को तैयार था।सबने उसे पकड़कर कमरे में बंद कर दिया।उसके बाद सबने निर्णय लिया कि अब मैं वहाँ नहीं रहूँगी।मैंने अपना थोड़ा-बहुत सामान पैक किया और हम वहाँ से निकल गए।तबसे मैं यहीं हूँ।माँ -बाप पर बोझ बन गई हूँ।इतना कहकर फिर सुबकने लगी।

 'स्वाति ,तुम रो क्यों रही हो ?ज़िंदगी बहुत लंबी है।ऐसे कैसे कटेगी?यह तो एक पड़ाव मात्र है।रवि से तलाक़ ले लो ।ऐसे रिश्तों का टूट जाना ही बेहतर है।आगे बढ़ो।भविष्य तुम्हारी प्रतीक्षा में है।बुरे स्वप्न की तरह सब भूल जाओ।पोछ डालो ये आंसू और ज़माने से लड़ने के लिए बन जाओ लक्ष्मीबाई।अपना रास्ता ख़ुद तय करो।तुम पढ़ी-लिखी हो।अच्छी नौकरी की तलाश करो।उनलोगों के बारे में सोचना बंद करो जिन्हें रिश्तों की कोई कद्र नहीं।समझो एक घिनौना पृष्ठ था यह तुम्हारी ज़िंदगी का।फाड़कर फेंक दो इसे।स्वाति को समझाते हुए उसे गले लगा लेती है।

    स्वाति सुबकते हुए कहती है, अरुणा, मेरे व्यक्तित्व पर तो दाग लग ही गया न ? अब मैं तलाक़शुदा कहलाऊंगी।कोई मुझसे शादी करने को तैयार नहीं होगा।लोग मेरी अच्छाइयाँ नहीं कमियाँ ढूंढेंगे।इसमें मैं कहाँ ग़लत हूँ?तुम्हीं बताओ न !

    'देखो स्वाति ,यह ज़माना किसी को भी अच्छा कहाँ कहता है।औरत होना ही गुनाह है।शादी में देर हो तो माँ-बाप का जीना दुश्वार, शादी के बाद बेटी चार दिन मैके में रह जाये तो लोग शक़ करने लगेंगे कि न जाने क्यों बेटी कई दिनों से यहीं पड़ी है।शादी के बाद एक-दो साल बच्चा न पैदा हो तो लोगों की नजरें सवाल करने लगती हैं।न जाने क्यों ज़माना औरतों के पीछे पड़ा रहता है।

 'बिल्कुल सही कह रही हो अरुणा, हर बात के लिए औरत को ही दोषी ठहराया जाता है।पुरुष के अंदर कोई ऐब होता ही नहीं।वह तो देवता है।पति परमेश्वर कहलाता है।हम कितना भी सभ्य हो जाएँ ,हमारी मानसिकता कभी नहीं बदल सकती।

 स्वाति की बातें सुनकर अरुणा ने हँसते हुए कहा,"ये हुई न बात।चलो छोड़ो ज़माने की बातें।कुछ अलग करके दिखाओ।आगे बढ़ो।मंज़िल तुम्हारी प्रतीक्षा में है।जब तुम कुछ हासिल कर लोगी तो वे ही लोग तुम्हारी अहमियत समझेंगे जिन्होंने तुम्हें समझा नहीं।बस ख़ुद को कभी कमज़ोर मत पड़ने देना।सफलताएँ तुम्हारे क़दम चूमेंगी।एक दिन सारी खुशियाँ तुम्हें मिलेंगी और चाहने वाला भी मिलेगा।वक्त आएगा तुम्हारी पनाहों में भी।

     'ठीक है अरुणा।तुम्हारी बातें याद रखूँगी।तुमने जो ऊर्जा जगाई है ,उसके लिए आभार।

     'स्वाति ,मुझे याद रखना।जब भी ज़रूरत पड़े याद करना।मैं तुम्हारे साथ हूँ।" यह कहकर वह चली गई।

   स्वाति ने मन में ठान लिया कि कुछ करके दिखाऊंगी।तलाक़ के लिए प्रयासरत है।ज़िंदगी आगे बढ़ चुकी है।

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