भारतीय खान पान ही उत्तम है

श्रीकांत यादव 

मन में जगती उमंग नहीं, 

जीवन नीरस न रवानी है |

भोंदू बनकर पड़े रहते हैं, 

जैसे खून निरा ही पानी है ||


बैठने मात्र से कमर टूटती, 

पैदल चलना ही भारी है |

खाने पर बस टूट हैं पडते, 

जैसे भूख की लगी बीमारी है ||


गाल हुआ गोलगप्पे जैसा, 

आंख चश्मे की आभारी है |

चरर मरर देह फूल करती ,

अभी पेट का बढना जारी है ||


कमर हुई छाती से चौडी, 

जांघें हाथी जैसी तैयार हैं |

थुलथुली देह घुटना तोड़े, 

बढ़ते वजन से लाचार हैं ||


चटपटे खानों के आगे तो, 

भारतीय खाने जैसे बेकार हैं |

तले भुने कुछ खट्टे मीठे, 

तीखे जायके मजेदार हैं ||


ऐसी सोच वाले भला कहां ,

भारतीय खाना अपनाएंगे |

विदेशी संस्कृति के पोषक, 

अपना वजन खूब बढाएंगे ||


जलवायु वही खाना बदला, 

काया तब कैसे ना बदले |

गाल कचौड़ी आँख पकौडी, 

क्यों ऐसा करते हैं पगले ||


दूध दही का देश हमारा, 

क्यों पेप्सी कोला पीते हैं |

स्वस्थ छरहरी काया के बदले, 

क्यों मोटापा लेकर जीते हैं ||


जप तप ज्ञान विज्ञान योग से, 

जगत गुरू भारत कहलाया |

खान पान भारतीय छोड़कर, 

सज्जनों क्यों विदेशी अपनाया ||


जलवायु अनुसार खाना पीना, 

स्वस्थ शरीर तो तब रहता है |

अपनी संस्कृति अपनी भाषा से, 

समाज सदा समुन्नत बनता है ||


पशुओं जैसी भक्षण प्रवृति,

जैसे बांडें में घूमते खाते हैं।

यदुवंशी कपड़ों में करके लीपा-पोती,

न सकुचाते न ही लजाते हैं।।


( श्रीकांत यादव )

प्रवक्ता हिंदी

आर सी-326 दीपक विहार

खोड़ा, गाजियाबाद

उ०प्र०!

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