आहत मन की आह

भावना ठाकर 'भावु'

कब तक चलेगा ये कालक्रम आपदा कटती ही नहीं, नैंनो की नमी सूखते-सूखते सहरा बन गई। ये दर्दनाक लम्हें छंटते ही नहीं। साँसे छूट रही है तन से, कई ज़िंदगीयाँ जूझ रही है, कोई मौत से जंग लड़ रही है, कुछ वक्त की साज़िश का मारा पेट की आग को ठंडी करने रोटी का जुगाड़ करते भटक रहा है, कई जानें आत्मीयता को तरस रही है। किसीकी माँ चल बसी, किसी माँ की गोद सूनी हुई, किसीके सर से पिता का साया हटा, किसी पिता का सहारा छीन गया, किसी बच्चीयों का शामियाना उजड़ गया, तो कई सुहागनों का सुहाग चल बसा उफ्फ़ कितनों की आह लिखें ? 

अकेली जान जो रह गई ज़ालिम दुनिया में घूम रहे गिद्धों के बीच कोई कितना संभाले खुद को सब्र का बांध टूट ही जाता है।

भूख से बिलखते बच्चे, नौकरी खो चुके लाचार युवा, बेसहारा बुढ़े बुज़ुर्ग, मृत्यु के मुख में चले गए घर के मुखिया के परिवार और शारीरिक तौर पर बेबस जन-जन के प्रति सौहार्द भाव सबको जगाना होगा। समाज को उपर उठाना होगा, देश को आगे बढ़ाना होगा, अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के हर कदम पर साथ मिलकर हमें चलना होगा वैमनस्य भूलाकर अपनों को थामना होगा तभी हर आँगन वापस खुशियों का सवेरा खिलेगा।

मन आहत होते ये कह रहा है कि,


कैसे सो सकते हो चैन की नींद सियासती बाशिंदों अपने घर में आराम से, जहाँ भूमि भारत की जल रही हो।

 

हर घर से अर्थीयां उठ रही हो मरघट का रुख़ करते, आँसूओं का इंसान आदी हो रहा हो। 


लाशों के ढेर पर खड़े अपनी जीत का जश्न कैसे मना सकते हो कैसे खून की नदीयां बहा कर जलती वसुधा पर अंजलि दे सकते हो।


टूट रहा है देश छूट रही है साँसे ज़िंदगी को तड़पते, ऐसे में व्यापार में मुनाफ़े की 

रफ़्तार कैसे देख सकते हो।

 

क्या इंसान की जान से ज़्यादा जरूरी कुछ भी हो सकता है क्यूँ मौत के तांडव को अनदेखा कर रहे हो अपने घर का कोना कोना जब जल रहा हो तब छत पर बैठकर महफ़िल कैसे सजा सकते हो।

 

जान है इंसान की कोई खिलौना नहीं 

उज़ाड कर इतने सारे घरौंदे अपनी कुर्सी का जुगाड़ करने की फ़िराक में भटक रहे हो।

(भावना ठाकर, बेंगुलूरु)#भावु

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