कवि डॉ अनुज कुमार चौहान "अनुज" की रचनाएं



 देखते-देखते आदमी खो गया 

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सादगी का शहर,अजनबी हो गया । 

देखते-देखते ,आदमी खो गया ।।

भीड़ बढ़ती रही,राह चलती रही ।

ढूंढ़ती आसरा ,गल प्रबलती रही ।।

मैं खड़ा उस जगह,मतलबी हो गया ।

देखते-देखते ,आदमी खो गया ।।

शब्द फूटे मिले,लाभ झून्ठे मिले ।

स्वप्न के दर्मियां ,आप रून्ठे मिले ।।

हौंसलों का शिखर ,कागजी हो गया ।

देखते-देखते ,आदमी खो गया ।।

मोह ममता ममीं,धुल गयी वह जमीं ।

मौन दिल बैठता,जम गईँ सब कमीं ।।

रीतियों का चलन ,लाजिमी हो गया ।

देखते-देखते,आदमी खो गया ।।

रास्ते क्या?बुनें,वास्ते क्या?चुनें ।

नापते वादियाँ ,कांपते क्या?सुनें ।।

दोस्तों में "अनुज ",दिल्लगी हो गया ।

देखते-देखते,आदमी खो गया ।।


 !!अवसरमयी आपदा !!

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मन -मन्दिर में साज सजाया ।

क्या ? खोया,क्या ?हमने पाया ।।

बीता वर्ष , रहा अलबेला ।

राही चलता ,राह अकेला ।।

हर्षित कभी,कभी सकुचाया ।

क्या ?खोया,क्या ? हमने पाया ।।

मानवता अस्तित्त्व,अधर में ।

जीवन-दर्शन,कैद लहर में ।।

अवसरमयी आपदा पाया ।

क्या ? खोया,क्या ?हमने पाया ।।

ईश्वर शरण,मानसिक चिन्तन ।

अहम् छोड़ ,सहयोग समर्थन ।।

वार , विषाणु का घवराया ।

क्या ? खोया,क्या ?हमने पाया ।।

जटिल शब्द,जीवन का हिस्सा ।

संकट समय ,अतीत-ए किस्सा ।।

कोहरा छटत , रवि मुस्काया ।

क्या ? खोया,क्या ?हमने पाया ।।

जिद हट और,पतन से नाता ।

अफवाह!असमंजस अन्नदाता ।।

आयुर्वेद , स्वदेशी  भाया  ।

क्या ?खोया ,क्या ?हमने पाया।।

दूर धुंधता,उद्यमता सानी  ।

सबसे आगे ,हिन्दुस्तानी ।।

छू नहीं पायी ,काली छाया ।

क्या ?खोया,क्या ?हमने पाया ।।

डॉ अनुज कुमार चौहान "अनुज"

अलीगढ़ ,उत्तर प्रदेश।

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