समय के नस

 लघुकथा 

विद्या शंकर विद्यार्थी 

आदमी के उत्पात पर समय एक दिन कबड्डी खेली आ आदमी के उत्पात हार जाई। ई बात लागते ना रहे। 

जगन बटाई के खेत लेके भिण्डी उपजइले रहन। हरियर तिअन छिपा में परे लागल रहे। आ जगन के टूटल परिवार के गिरल रोआँ फरिआये लागल रहे। 

बाकि केदार (खेत ओला) के टिसुना जगन के हरियर भिण्डी लाग गइल । केदार रोब देखावत कहलन - ' हमरो कराही में भिण्डी बने के चाहीं, चहुँपावल करऽ, बुझलऽ । '


' हमरा मेहनत पर आँख काहे लागता जी , अधिकार त जेठ के पुरनिमा तक बा, हमार। '


' ना, हमरा चाह तक। '


' हम ना जानत रहीं चाह के अइसन डाह होई। आ जब अइसन ख्याल बा त तूर ले जाईं रउरा । '


' तोहार हिम्मत हमरा से रगरा करत बा, आ आँख उठा के बतियावत बा। '


जगन समझ गइलन इनिका से लागल आपन बरबादी बा। लइका सेयान हो जइहन स त अपने कमाये खाये के दोसर राहता निकल जाई। 


समय आज बदल गइल बा। जगन के सब लइका बहरा कमात बाड़न स। उत्पात अब आपन धुंधराह आँख मिसता। समय के नस चाहीं चिन्हे के। 




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