कोरोना संकट में कालाबाजारी मानवीय संवेदना के हृास का परिचायक

 

अमिताभ पाण्डेय

भारत वर्ष जहां पीड़ित मानवता की सेवा के दायित्व को बड़े गर्व से स्वीकार किया जाता रहा है। उसी को परिभाषित करते हुए महाकवि तुलसीदास ने कहा कि-


परहित सरिस धरम नहिं भाई ।

पर पीड़ा सम नहिं अधमाई ।।

अर्थात

परोपकार से बढ़कर कोई उत्तम कर्म नहीं और दूसरों को कष्ट देने से बढ़कर कोई नीच कर्म नहीं । परोपकार की भावना ही वास्तव में मनुष्य को ‘मनुष्य’ बनाती है । कभी किसी भूखे व्यक्ति को खाना खिलाते समय चेहरे पर व्याप्त सन्तुष्टि के भाव से जिस असीम आनन्द की प्राप्ति होती है, वह अवर्णनीय है ।

किसी वास्तविक अभावग्रस्त व्यक्ति की नि:स्वार्थ भाव से अभाव की पूर्ति करने के बाद जो सन्तुष्टि प्राप्त होती है, बह अकथनीय है । परोपकार से मानव के व्यक्तित्व का विकास होता है ।

व्यक्ति ‘स्व’ की संकुचित भावनाओं की सीमा से निकलकर ‘पर’ के उदात्त धरातल पर खड़ा होता है, इससे उसकी आत्मा का विस्तार होता है और वह जन-जन के कल्याण की ओर अग्रसर होता है । इतने पवित्र संकल्प को धारण करने वाले देश में न जाने किन नकारात्मक शक्तियों ने अपने प्रभाव में ले लिया जहां मुनाफा खोर और कालाबाजारी में संलिप्त कुछ लोग मानवता को शर्मशार करने में लगे हुए हैं।

  गत वर्ष 11जून 2020 को इंडियन चैम्बर ऑफ कॉमर्स के एनुअल प्लेनरी सेशन में उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने उद्बोधन में कहा था कि कोरोना काल की आपदा को हमें अवसर में बदलना होगा, देश को आत्म निर्भर बनाना होगा। प्रधानमंत्री महोदय के उक्त सकारात्मक संदेश को स्वार्थ के वशीभूत होकर कुछ लोगों ने अपने ढंग से परिभाषित करते हुए मानवता को शर्मशार कर देने वाली गतिविधियों में अपने को संलग्न कर लिया । वर्तमान समय में जब पूरा देश कोरोना महामारी के दंश से कराह रहा है, देश की जनता चिकित्सा सुविधा, आक्सीजन, जीवन रक्षक दवाओं, उपकरणों एम्बुलेंस के लिए मारी मारी फिर रही है ऐसे समय में मानवीय संवेदनाओं को खो चुके नरपिपाशु लोग अपनी कमाई के अवसर के रूप में अवसर तलाश रहे हैं। देश के छोटे बड़े शहरों में आक्सीजन की कालाबाजारी हो रही है तमाम नीजी अस्पतालो के संचालक मरीजों की जान का सौदा करते हुए सरकार द्वारा निर्धारित शुल्क से कई गुना अधिक शुल्क वसूल रहे हैं। देश के छोटे बड़े शहरों में रेमेडेसीवियर इंजेक्शन की कालाबाजारी चरम पर है। नीजी एम्बुलेंस चालक प्रति किमी का किराया दो हजार रुपए लेने में गुरेज नहीं कर रहे हैं। राजनैतिक दलों से जुड़े लोगों की संलिप्तता भी सामने आ रही है। तमाम जगहों पर चिकित्सक व मेडिकल स्टाफ जीवन रक्षक दवाओं की कालाबाजारी में पकड़े जा रहे हैं। सर्वाधिक शर्मशार करने वाली घटना उत्तर प्रदेश के बागपत में पकड़ी गई जहां सात लोग श्मशान से कफ़न चोरी कर उसपर स्टीकर लगाकर बेचते हुए पाए गए हैं।मैं यह नहीं कह रहा कि हर व्यक्ति इन अनैतिक गतिविधियों में संलिप्त हैं, निश्चित रूप से अधिकांश लोग अपने दायित्वों का निर्वहन इमानदारी से कर रहे हैं, लेकिन कहावत है कि एक ही मछली पूरे तालाब को गन्दा कर देती है। विचारणीय बिंदु है कि  प्रत्येक व्यक्ति को इस महामारी की आपदा में स्व का विकास करते हुए अपने को नैतिक रुप से मजबूत करना होगा,तभी  सशक्त व स्वस्थ भारत का निर्माण होगा।


अमिताभ पाण्डेय, गोरखपुर,उ.प्र.

मो.नं. - 9415640651

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